बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 330, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३२४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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अन्न साधारण है अर्थात् यह जो खाया जाता है, वही इसका साधारण अन्न है। जो इसकी उपासना करता है, वह पापसे दूर नहीं होता; क्योंकि यह अन्न मिश्र ( समस्त प्राणियोंका सम्मिलित रूप ) है। दो अन्न उसने देवताओंको बाँटे—वे हुत और प्रहुत हैं इसलिये गृहस्थ पुरुष देवताओंके लिये हवन और बलि-हरण करता है। कोई ऐसा भी कहते हैं कि ये दो अन्न दर्श और पूर्णमास हैं; इसलिये काम्य इष्टियोंके यजनमें प्रवृत्त न हो। एक अन्न पशुओंको दिया, वह दुग्ध है। मनुष्य और पशु पहले दुग्धके ही आश्रय जीवन धारण करते हैं, इसलिये उत्पन्न हुए बालकको पहले घृत चटाते हैं या स्तनपान कराते हैं; तथा उत्पन्न हुए बछड़ेको भी अतृणाद ( तृण भक्षण न करनेवाला ) कहते हैं। जो प्राणनक्रिया करते हैं और जो नहीं करते, वे सब इस ( पश्वन्न ) में ही प्रतिष्ठित हैं। अर्थात् जो प्राणन करते हैं और जो नहीं करते, वे सब दुग्धमें ही प्रतिष्ठित हैं। अतः ऐसा जो कहते हैं कि एक सालतक दुग्धसे हवन करनेवाला पुरुष अपमृत्युको जीत लेता है, सो ऐसा नहीं समझना चाहिये; क्योंकि वह जिस दिन हवन करता है, उसी दिन अपमृत्युको जीत लेता है [ एक सालकी अपेक्षा नहीं करता ]। इस प्रकार जाननेवाला ( उपासना करनेवाला ) पुरुष देवताओंको सम्पूर्ण अन्नाद्य प्रदान करता है। किंतु सर्वदा खाये जानेपर भी वे अन्न क्षीण क्यों नहीं होते ? इसका कारण यह है कि पुरुष अविनाशी है, वही पुनः-पुनः इस अन्नको उत्पन्न कर देता है। जो भी इस अक्षयभावको जानता है अर्थात् पुरुष ही क्षयरहित है, वही इस अन्नको ज्ञान और कर्मद्वारा उत्पन्न कर देता है, यदि वह इसे उत्पन्न न करता तो यह क्षीण हो जाता—[ ऐसा जो जानता है ] वह प्रतीकके द्वारा—मुख प्रतीक है अर्थात् मुखके द्वारा अन्न भक्षण करता है। वह देवताओंको प्राप्त होता है और अमृतका उपजीवी होता है। यह ( फलश्रुति ) प्रशंसा है॥ २॥
| तत्र ‘यत्सप्तान्नानि मेधया तपसाजनयत्पिता’ इत्यस्य कोऽर्थ उच्यते ? इति हि शब्देनैव व्याचष्टे | उपर्युक्त ‘यत्सप्तान्नानि मेधया तपसाजनयत्पिता’ इत्यादि प्रथम मन्त्रका क्या अर्थ बताया जाता है ? इस प्रश्नके उत्तरमें यह द्वितीय |
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