बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 332, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें३२६, बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय १
| संस्कृत | हिन्दी |
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| नेन। ब्रह्मविद्याविषये च सर्वैकत्वात्कामानुपपत्तेः। | जो विषय है, उसमें तो सबकी एकता हो जानेके कारण कामनाका होना सम्भव ही नहीं है।¹ |
| एतेनाशास्त्रीयप्रज्ञातपोभ्यां स्वाभाविकाभ्यां जगत्स्रष्टृत्वमुक्तमेव भवति; स्थावरान्तस्य चानिष्टफलस्य कर्मविज्ञाननिमित्तत्वात्। | इस² उपर्युक्त कथनसे यानी अविद्याजनित काम ही संसार-बन्धनका कारण है—ऐसा दिखलाये जानेसे अशास्त्रीय एवं स्वाभाविक ज्ञान-कर्मोंके द्वारा संसारकी सृष्टि होती है—यह भी प्रतिपादित ही हो जाता है; क्योंकि स्थावर-पर्यन्त सारा अनिष्ट फल कर्म और विज्ञानसे ही होनेवाला है। |
| विवक्षितस्तु शास्त्रीय एव साध्यसाधनभावो ब्रह्मविद्याविधित्सया तद्वैराग्यस्य विवक्षितत्वात्। | किंतु यहाँ शास्त्रीय साध्य-साधनभाव ही बताना इष्ट है, क्योंकि ब्रह्म-विद्याका विधान करनेकी इच्छासे उस (साध्य-साधन) में वैराग्य बतलाना आवश्यक है। |
| सर्वो ह्ययं व्यक्ताव्यक्तलक्षणः संसारोऽशुद्धोऽनित्यः साध्यसाधनरूपो दुःखोऽविद्या- | यह व्यक्त और अव्यक्तरूप सारा ही संसार अशुद्ध, अनित्य, साध्य-साधनरूप, दुःखमय और |
१. यहाँ यह शङ्का होती है कि जिस प्रकार जाया आदि विषयक कामना संसारबन्धनमें डालनेवाली है, उसी प्रकार मोक्षविषयक कामना भी हो सकती है; क्योंकि कामनामात्र बन्धनकी हेतु है, इसके उत्तरमें कहते हैं--ब्रह्मविद्याके विषयमें कामना नहीं होती। कामना रागके कारण होती है और राग अन्यमें होता है। ब्रह्मविद्याके विषयभूत मोक्षमें द्वैतका सर्वथा अभाव है; अतः कामना नहीं होती।
२. यदि कोई कहे, 'जाया मे स्यात्' इत्यादि शास्त्रवचनोंके द्वारा जायादि-विषयक कामनाका उल्लेख होनेसे वह शास्त्रीय है; अतः शास्त्रीय कामना संसारोत्पत्तिमें हेतु हो, किंतु अशास्त्रीय कर्म आदि क्योंकर कारण हो सकते हैं? तो इसके उत्तरमें कहते हैं--इस उपर्युक्त कथनसे इत्यादि।