बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 351, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 351
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३४५
| [संस्कृत मूल/भाष्य] | [हिन्दी अनुवाद] |
|---|---|
| (मनसोऽस्तित्वे लिङ्गान्तरनिर्देशः)<br><br>मनोऽस्तित्वं प्रत्यन्यच्च कारणमुच्यते—तस्मान्मनो नामास्त्यन्तःकरणम्, यस्माच्चक्षुषो ह्यगोचरे पृष्ठतोऽप्युपस्पृष्टः केनचिद् हस्तस्यायं स्पर्शो जानोरयमिति विवेकेन प्रतिपद्यते। यदि विवेककृन्मनो नाम नास्ति तर्हि त्वङ्मात्रेण कुतो विवेकप्रतिपत्तिः स्यात् ? यत्तद्विवेकप्रतिपत्तिकारणम्, तन्मनः। | मनके अस्तित्वके विषयमें एक दूसरा भी कारण बतलाया जाता है—इससे भी मननामक अन्तःकरणकी सत्ता है, क्योंकि नेत्रके सामने न आकर किसीके द्वारा पीठपर स्पर्श किये जानेपर मनुष्य विवेकद्वारा यह जान लेता है कि 'यह स्पर्श हाथका है या जानुका है।' यदि विवेक करनेवाला मन नहीं है, तो त्वचामात्रसे ऐसा विवेकज्ञान कैसे हो सकता है ? जो उस विवेकज्ञानका कारण है, वही मन है। |
| अस्ति तावन्मनः, स्वरूपं च तस्याधिगतम्। त्रीण्यन्नानीह फलभूतानि कर्मणां मनोवाक्प्राणाख्यान्यध्यात्ममधिभूतमधिदैवं च व्याचिख्यासितानि। तत्र आध्यात्मिकानां वाङ्मनःप्राणानां मनो व्याख्यातम्। अथेदानीं वाग्वक्तव्येत्यारम्भः— | अतः सारांश यह है कि मन है और उसका स्वरूप भी ज्ञात हो गया। यहाँ कर्मोंके फलभूत मन, वाक् और प्राणसंज्ञक अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैव तीन अन्नोंकी व्याख्या करनी है। उनमेंसे आध्यात्मिक वाक्, मन और प्राणोंमेंसे मनकी व्याख्या तो कर दी गयी। अब वाक्का वर्णन करना है, इसलिये आरम्भ किया जाता है— |
| (वाङ्निरूपणम्)<br><br>यः कश्च लोके शब्दो ध्वनिस्ताल्वादिव्यङ्ग्यः प्राणिभिर्वर्णादिलक्षण इतरो वा वादित्रमेघादिनिमित्तः सर्वो ध्वनिर्वागेव सा। | लोकमें प्राणियोंद्वारा तालु आदिसे व्यक्त होनेवाला जितना भी वर्णादिरूप शब्द यानी ध्वनि है तथा बाजे या मेघादिके कारण होनेवाला और भी जो कोई शब्द है सब वाक् |