भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 356, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 356
३५०बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

| विदं तद्विज्ञातं भूत्वा अवति पालयति, विज्ञातरूपेणैवास्यान्नं भोज्यतां प्रतिपद्यत इत्यर्थः ॥ ८ ॥ | वाक्‌की विभूतिको जाननेवालेका उसकी विज्ञात होकर अवन यानी पालन करती है, अर्थात् वह विज्ञात-रूपसे ही इसका अन्न होती यानी भोज्यताको प्राप्त होती है ॥ ८ ॥ | | तथा— | तथा— |

यत्किञ्च विजिज्ञास्यं मनसस्तद्रूपं मनो हि विजिज्ञास्यं मन एनं तद्भूत्वावति ॥ ९ ॥

जो कुछ विजिज्ञास्य है, वह मनका रूप है। मन ही विजिज्ञास्य है। मन विजिज्ञास्य होकर इसकी रक्षा करता है ॥ ९ ॥

| यत्किञ्च विजिज्ञास्यम्, विस्पष्टं ज्ञातुमिष्टं विजिज्ञास्यम्, तत्सर्वं मनसो रूपम्; मनो हि यस्मात्सन्दिह्यमानाकारत्वाद्विजिज्ञास्यम्। पूर्ववन्मनोविभूतिविदः फलम्—मन एनं तद्विजिज्ञास्यं भूत्वा अवति विजिज्ञास्यस्वरूपेणैवान्नत्वमापद्यते ॥ ९ ॥ | जो कुछ विजिज्ञास्य यानी विस्पष्ट जाननेके लिये इष्ट है, वह सब मनका रूप है; क्योंकि मन ही सन्देहयोग्य स्वरूपवाला होनेके कारण विजिज्ञास्य है। पहलेहीके समान मनकी विभूतिको जाननेवालेका फल बतलाया जाता है—मन उसका विजिज्ञास्य होकर उसकी रक्षा करता है, अर्थात् वह विजिज्ञास्य-स्वरूपसे ही उसके अन्नत्वको प्राप्त होता है ॥ ९ ॥ | | तथा— | तथा— |

यत्किञ्चाविज्ञातं प्राणस्य तद्रूपं प्राणो ह्यविज्ञातः प्राण एनं तद्भूत्वावति ॥ १० ॥