बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 369, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 369
| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ३६३ |
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| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| न्तं परोक्षो मन्तव्यः, यस्मादयमेव स प्रत्यक्ष उपलभ्यते। कोऽसावयम्? यो यथोक्तं त्र्यन्नात्मकं प्रजापतिमात्मभूतं वेत्ति स एवंवित्पुरुषः। | मानना चाहिये; क्योंकि वह प्रत्यक्ष यही उपलब्ध होता है। वह यह कौन है?—जो उपर्युक्त अन्नत्रयरूप आत्मभूत प्रजापतिको जानता है, वह इस प्रकार जाननेवाला पुरुष। |
| केन सामान्येन प्रजापतिरिति तदुच्यते—तस्यैवंविदः पुरुषस्य गवादि वित्तमेव पञ्चदश कला उपचयापचयधर्मित्वात्; तद्वित्तसाध्यं च कर्म। तस्य कृत्स्नतायै आत्मैव पिण्ड एवास्य विदुषः षोडशी कला ध्रुवस्थानीया। स चन्द्रवद्वित्तेनैवापूर्यते चापक्षीयते च—तदेतल्लोके प्रसिद्धम्। | वह किस समानताके कारण प्रजापति है, सो बतलाया जाता है—उस इस प्रकार जाननेवाले पुरुषकी गौ आदि वित्त ही पंद्रह कलाएँ हैं, क्योंकि वे वित्त वृद्धि-ह्रास धर्मवाले हैं और कर्म भी उस वित्तसे ही साध्य है*। उसकी पूर्णताके लिये इस विद्वान्का आत्मा यानी पिण्ड ही ध्रुवस्थानीया सोलहवीं कला है। वह चन्द्रमाके समान वित्तसे ही बढ़ता और अपक्षीण होता है—यह लोकमें प्रसिद्ध है। |
| तदेतन्नभ्यम्, नाभ्यै हितं नभ्यं नाभिं वा अर्हतीति। किं तत्? यदयं योऽयमात्मा पिण्डः। प्रधिर्वित्तं परिवारस्थानीयं बाह्यं चक्र- | वह यह नभ्य है, 'नाभ्यै हितम्' अथवा 'नाभिम् अर्हति' इस व्युत्पत्ति के अनुसार जो नाभिके लिये हितरूप अथवा नाभिकी योग्यता रखता हो उसे 'नभ्य' अर्थात् चक्रका मध्य भाग कहते हैं। वह कौन? यह जो आत्मा अर्थात् पिण्ड है। वित्त प्रधि यानी बाह्य परिवाररूप है, जैसे |
* अर्थात् जिस प्रकार जगत्का विपरिणाम चन्द्रमाकी कलाओंसे साध्य है उसी प्रकार जगत्का समस्त कार्य वित्तसे साध्य है।