भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 37, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 37
ब्राह्मण १ ]शाङ्करभाष्यार्थ३१

शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
सेयं षडध्यायी अरण्येऽनूच्यमानत्वादारण्यकम्, बृहत्त्वात्परिमाणतो बृहदारण्यकम्। तस्यास्य कर्मकाण्डेन सम्बन्धोऽभिधीयते। सर्वोऽप्ययं वेदः प्रत्यक्षानुमानाभ्यामनवगतेष्टानिष्टप्राप्तिपरिहारोपायप्रकाशनपरः सर्वपुरुषाणां निसर्गत एव तत्प्राप्तिपरिहारयोरिष्टत्वात्। दृष्टविषये चेष्टानिष्टप्राप्तिपरिहारोपायज्ञानस्य प्रत्यक्षानुमानाभ्यामेव सिद्धत्वान्नागमान्वेषणा।यह छः अध्यायवाली उपनिषद् अरण्य (वन) में कही जानेके कारण आरण्यक है और [अन्य उपनिषदोंकी अपेक्षा] परिमाणमें बृहद् (बड़ी) होनेके कारण बृहदारण्यक कही जाती है। अब इसका कर्मकाण्डके साथ सम्बन्ध बतलाया जाता है। यह सारा ही वेद, जिनका प्रत्यक्ष और अनुमान आदि अन्य प्रमाणोंसे ज्ञान नहीं होता, उन इष्टकी प्राप्ति और अनिष्टकी निवृत्तिके उपायोंको प्रकाशित करनेवाला है, क्योंकि सभी पुरुषोंको स्वभावसे ही इष्टकी प्राप्ति और अनिष्टकी निवृत्ति इष्ट है। जो विषय प्रत्यक्ष हैं उनमें इष्टप्राप्ति और अनिष्टनिवृत्तिके उपायोंका ज्ञान तो प्रत्यक्ष और अनुमान प्रमाणोंसे ही सिद्ध है, इसलिये वहां आगमप्रमाण ढूँढनेकी आवश्यकता नहीं होती।
[आत्मतत्त्वनिरूपणे शास्त्रस्यार्थवत्त्वम्]<br>न चासति जन्मान्तरसम्बन्ध्यात्मास्तित्वविज्ञाने जन्मान्तरेष्टानिष्टप्राप्तिपरिहारेच्छा स्यात् स्वभाववादिदर्शनात्। तस्मा-किंतु जन्मान्तरसे सम्बन्ध रखनेवाले आत्माके अस्तित्वका ज्ञान न होनेपर जन्मान्तर-सम्बन्धिनी इष्टप्राप्ति और अनिष्ट-निवृत्तिकी इच्छा भी नहीं हो सकती, जैसा कि स्वभाववादियों (चार्वाकादिकों) में देखा जाता है¹। अतः शास्त्र

१. अर्थात् आत्माके अस्तित्वको न जाननेवाले लोकायतिक और बौद्धोंकी जन्मान्तरमें इष्ट-प्राप्ति और अनिष्ट-परिहारके उद्देश्यसे वैदिक क्रियाओंमें प्रवृत्ति नहीं होती—यह बात देखी गयी है।

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