भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 371, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 371

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३६५


अथ त्रयो वाव लोका मनुष्यलोकः पितृलोको देवलोक इति सोऽयं मनुष्यलोकः पुत्रेणैव जय्यो नान्येन कर्मणा कर्मणा पितृलोको विद्यया देवलोको देवलोको वै लोकानाꣳ श्रेष्ठस्तस्माद्विद्यां प्रशꣳसन्ति ॥ १६ ॥

अथ मनुष्यलोक, पितृलोक और देवलोक—ये ही तीन लोक हैं। वह यह मनुष्यलोक पुत्रके द्वारा ही जीता जा सकता है, किसी अन्य कर्मसे नहीं। तथा पितृलोक कर्मसे और देवलोक विद्यासे जीते जा सकते हैं। लोकोंमें देवलोक ही श्रेष्ठ है; इसलिये विद्याकी प्रशंसा करते हैं ॥ १६ ॥

संस्कृत भाष्यहिन्दी अनुवाद
अथेति वाक्योपन्यासार्थः। त्रयः, वावेत्यवधारणार्थः। त्रय एव शास्त्रोक्तसाधनार्हा लोकाः, न न्यूना नाधिका वा। के ते? इत्युच्यते—मनुष्यलोकः पितृलोको देवलोक इति।'अथ' यह शब्द वाक्यारम्भके लिये है। 'त्रयो वाव' इसमें 'वाव' निश्चयार्थक है। शास्त्रोक्त साधनसे प्राप्त होने योग्य तीन ही लोक हैं; न इससे कम हैं, न अधिक। वे कौन-से हैं? सो बतलाये जाते हैं—मनुष्यलोक, पितृलोक और देवलोक।
तेषां सोऽयं मनुष्यलोकः पुत्रेणैव साधनेन जय्यो जेतव्यः साध्यः—यथा च पुत्रेण जेतव्यस्तथोत्तरत्र वक्ष्यामः,—नान्येन कर्मणा, विद्यया वेति वाक्यशेषः।उनमें वह यह मनुष्यलोक पुत्ररूप साधनके द्वारा ही जीता जा सकने योग्य, जीतनेके लायक अर्थात् साध्य (प्राप्त करने योग्य) है। वह पुत्रद्वारा किस प्रकार प्राप्तव्य है, सो आगे बतलावेंगे। किसी अन्य कर्म अथवा विद्यासे नहीं। यहाँ 'विद्यया वा' (अथवा विद्यासे) यह वाक्यशेष है।
कर्मणा अग्निहोत्रादिलक्षणेन केवलेन पितृलोको जेतव्यो न पुत्रेण नापि विद्यया। विद्ययाअग्निहोत्रादिरूप केवल कर्मसे पितृलोक जीतने योग्य है—पुत्रसे अथवा विद्यासे नहीं। तथा विद्यासे