भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 380, कुल 1402 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 380
३७४बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १

सम्प्रत्तिकर्मकर्तामें वागादि प्राणोंके आवेशका प्रकार

| पाङ्क्तकर्मणो मोक्षार्थत्वनिरासः<br>कथमिति वक्ष्यति पृथिव्यै चैनमित्यादि । एवं पुत्रकर्मापरविद्यानां मनुष्यलोकपितृलोकदेवलोकसाध्यार्थता प्रदर्शिता श्रुत्या स्वयमेव । अत्र केचिद्भावदूकाः श्रुत्युक्तविशेषार्थानभिज्ञाः सन्तः पुत्रादिसाधनानां मोक्षार्थतां वदन्ति । तेषां मुखापिधानं श्रुत्येदं कृतम्—जाया मे स्यादित्यादि पाङ्क्तं काम्यं कर्मेत्युपक्रमेण, पुत्रादीनां च साध्यविशेषविनियोगोपसंहारेण च । तस्मादृणश्रुतिरविद्वद्विषया न परमात्मविद्विषयेति सिद्धम् । वक्ष्यति च—"किं प्रजया करिष्यामो येषां नोऽयमात्मायं लोकः" ( ४ । ४ । २२) इति । | किस प्रकार आविष्ट होते हैं, सो 'पृथिव्यै चैनम्' इत्यादि श्रुति बतलावेगी । इस प्रकार श्रुतिने स्वयं ही पुत्र, कर्म और अपरा विद्याको मनुष्यलोक, पितृलोक एवं देवलोककी प्राप्तिके साधनरूपसे दिखलाया । यहाँ कुछ वाचाललोग श्रुतिप्रतिपादित विशेष अर्थको न समझकर पुत्रादि साधनोंकी मोक्षार्थता बतलाते हैं। परंतु श्रुतिने—'मेरे स्त्री हो' इत्यादि पाङ्क्त काम्य कर्म है—इस उपक्रमसे तथा पुत्रादिका [ मनुष्यलोकादि ] साध्यविशेषमें विनियोग करनारूप उपसंहारसे उनका मुख बंद कर दिया है। इसलिये यह सिद्ध हुआ कि ऋणत्रयका प्रतिपादन करनेवाली श्रुतिका अधिकारी अज्ञानी है, परमात्मवेत्ता नहीं। आगे श्रुति कहेगी भी कि "हम, जिनका यह आत्मा ही लोक है, प्रजासे क्या करेंगे ?" इत्यादि। | | समुच्चयवाद-निराकरणम्<br>केचित्तु पितृलोकदेवलोकजयोऽपि पितृलोकदेवलोकाभ्यां व्यावृतिरेव; तस्मात्पुत्रकर्मापरविद्याभिः समुच्चितानुष्ठिताभिस्त्रिभ्य एते- | किन्हीं-किन्हींका मत है कि पितृलोक और देवलोकको जीतना भी पितृलोक और देवलोकसे निवृत्त होना ही है। अतः समुच्चयपूर्वक [अर्थात् एक साथ ] अनुष्ठान किये हुए पुत्र, कर्म और अपराविद्याद्वारा |