भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 383, कुल 1402 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 383

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३७७


| तत्तद् भवति, अमोघा अप्रतिबद्धा अस्य वाग्भवतीत्यर्थः ॥ १८ ॥ | जो कहता है वही-वही हो जाता है। अर्थात् इसकी वाणी अमोघ—प्रतिबन्धरहित हो जाती है ॥ १८ ॥ |

| तथा— | तथा— |

दिवश्चैनमादित्याच्च दैवं मन आविशति तद्वै दैवं मनो येनानन्द्येव भवत्यथो न शोचति ॥ १६ ॥

द्युलोक और आदित्यसे इसमें दैव मनका आवेश हो जाता है। दैव मन वही है, जिससे यह आनन्दी ही होता है, कभी शोक नहीं करता ॥ १६ ॥

| दिवश्चैनमादित्याच्च दैवं मन आविशति—तच्च दैवं मनः; स्वभावनिर्मलत्वात्; येन मनसा असौ आनन्द्येव भवति सुख्येव भवति; अथो अपि न शोचति, शोकादिनिमित्तासंयोगात् ॥ १९ ॥ | द्युलोक और आदित्यसे इसमें दैव मन आविष्ट हो जाता है। स्वभावसे ही निर्मल होनेके कारण दैव मन वही है, जिस मनसे यह आनन्दी—सुखी ही होता है और शोकादिके कारणोंका संयोग न होनेसे कभी शोक नहीं करता ॥ १६ ॥ |


| तथा— | तथा— |

अद्भ्यश्चैनं चन्द्रमसश्च दैवः प्राण आविशति स वै देवः प्राणो यः सञ्चरँश्चासञ्चरँश्च न व्यथतेऽथो न रिष्यति। स एवंवित्सर्वेषां भूतानामात्मा भवति, यथैषा देवतैवँ स यथैतां देवताँ सर्वाणि भूतान्यवन्त्येवँ हैवंविदँ सर्वाणि भूतान्यवन्ति। यदु किञ्चेमाः प्रजाः