बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 386, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 386
| ३८० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
|---|
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
|---|---|
| क्रुष्ट इति। अस्य तु सर्वात्मनो य आक्रुश्यते यश्चाक्रोशति तयोरात्मत्वबुद्धिविशेषाभावान्न तन्निमित्तं दुःखमुपपद्यते। मरणदुःखवच्च निमित्ताभावात् यथा हि कस्मिंश्चिन्मृते कस्यचिद् दुःखमुत्पद्यते—ममासौ पुत्रो भ्राता चेति, पुत्रादिनिमित्तम्; तन्निमित्ताभावे तन्मरणदर्शिनोऽपि नैव दुःखमुपजायते, तथेश्वरस्याप्यपरिच्छिन्नात्मनो ममत्वतादिदुःखनिमित्तमिथ्याज्ञानादिदोषाभावान्नैव दुःखमुपजायते। | इस सर्वात्माको तो, जिसे गाली दी जाती है और जो गाली देता है, उन दोनोंके प्रति आत्मत्वबुद्धिमें कोई भेद न होनेके कारण उसे तज्जनित दुःख होना सम्भव ही नहीं है। जिस प्रकार कि कोई निमित्त न होनेसे मरण-दुःख भी नहीं होता। जैसे [लोकमें] किसीके मर जानेसे किसीको 'यह मेरा पुत्र है, यह मेरा भाई है' ऐसा सोचकर पुत्रादिके कारण दुःख उत्पन्न होता है तथा वैसा निमित्त न होनेपर उसकी मृत्युको देखनेवालेको भी दुःख नहीं होता उसी प्रकार मेरे-तेरेपन आदि दुःखके निमित्त और मिथ्या ज्ञानादि दोषका अभाव होनेके कारण अपरिच्छिन्नरूप ईश्वरको भी दुःख नहीं होता। |
| तदेतदुच्यते—यदु किञ्च यत् किञ्च इमाः प्रजाः शोचन्त्यमैव सहैव प्रजाभिस्तच्छोकादिनिमित्तं दुःखं संयुक्तं भवत्यासां प्रजानां परिच्छिन्नबुद्धिजनितत्वात्। सर्वात्मनस्तु केन सह किं संयुक्तं भवेद्वियुक्तं वा? अमुं तु प्राजापत्ये पदे वर्तमानं पुण्यमेव शुभमेव— | इसीसे यह कहा जाता है—जो कुछ भी ये प्रजाएँ शोक करती हैं, वह शोकादिजनित दुःख उन प्रजाओंके साथ ही संयुक्त रहता है, क्योंकि वह इन प्रजाओंकी परिच्छिन्न बुद्धिसे पैदा होता है। किंतु जो सर्वात्मा है, उसके लिये वह किसके साथ संयुक्त या वियुक्त होगा? इस प्राजापत्यपदपर वर्तमान विद्वान्को तो पुण्य ही प्राप्त होता है। यहाँ शुभ |