भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 404, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 404
३९८बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय १
अयमात्मायं पिण्डः कार्यकारणा-तमसङ्घातः तथाऽन्नत्रये व्याख्यातः 'एतन्मयो वा अयमात्मा' इत्यादिना; एतावद्धीदं सर्वं व्याकृतमव्याकृतं च यदुत नाम रूपं कर्मेति, आत्मा उ एकोऽयं कार्यकरणसङ्घातः सन्नध्यात्मधिभूताधिदैवभावेन व्यवस्थितमेतदेव त्रयं नाम रूपं कर्मेति । तदेतल्लक्ष्यमाणम् ।है—यह आत्मा—यह कार्य-करणात्मक सं build संघातरूप पिण्ड तथा अन्नत्रयके प्रकरणमें "यह आत्मा एतद्रूप है" इस श्रुतिसे जिसकी व्याख्या की गयी है वह, बस—यह जो नाम, रूप और कर्म है, इतना ही यह सारा व्याकृत और अव्याकृत [जगत्] है; और आत्मा भी एक यह कार्यकरणसंघातमात्र होते हुए यही एक अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैव भावसे स्थित नाम, रूप, कर्म यह त्रय है। उसीका यह आगे वर्णन किया जाता है।
अमृतं सत्येनच्छन्नमित्येतस्य वाक्यस्यार्थमाह—प्राणो वा अमृतं करणात्मकोऽन्तरुपष्टम्भक आत्मभूतोऽमृतोऽविनाशी; नामरूपे सत्यं कार्यात्मके शरीरावस्थे; क्रियात्मकस्तु प्राणस्तयोरुपष्टम्भको बाह्याभ्यां शरीरात्मकाभ्यामुपजनापायधर्मिभ्यां मर्त्याभ्यां छन्नोऽप्रकाशीकृतः । एतदेवअब श्रुति 'अमृतं सत्येनच्छन्नम्' इस वाक्यका अर्थ करती है—'प्राणो वा अमृतम्'—जो इन्द्रियरूप, शरीरका आन्तर आधारभूत और आत्मस्वरूप है वह प्राण ही अमृत—अविनाशी है तथा शरीरावस्थित कार्यात्मक नाम-रूपं सत्य हैं। उनका आधारभूत क्रियात्मक प्राण वृद्धि-क्षयशील, बाह्य, शरीरस्वरूप, मरणधर्मा नाम और रूपोंसे आच्छादित—अप्रकाशित किया हुआ है। यह