भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 410, कुल 1402 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 410
४०४बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय २

| यिकार्थः । यथा हि गार्ग्या-जातशत्र्वोर्तीव श्रद्धालुता दृश्यते आख्यायिकायाम्; “श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानम्” ( गीता ४ । ३९ ) इति च स्मृतिः । | सर्वोत्तम साधन है। इसीसे आख्यायिकामें गार्ग्य और अजातशत्रुकी अत्यन्त श्रद्धालुता देखी जाती है। “श्रद्धावान् पुरुष ज्ञान-लाभ करता है” ऐसी स्मृति भी है। |

ब्रह्मविद्याका उपदेश करनेके लिये अपने पास आये हुए गार्ग्यको अजातशत्रुका सहस्र गौ दान करना

ॐ । दृप्तबालाकिर्हानूचानो गार्ग्य आस स होवाचाजातशत्रुं काश्यं ब्रह्म ते ब्रवाणीति स होवाचाजातशत्रुः सहस्रमेतस्यां वाचि दद्मो जनको जनक इति वै जना धावन्तीति ॥ १ ॥

ॐ [ किसी समय कोई ] गार्ग्यगोत्रोत्पन्न दृप्त ( गर्वीला ) बालाकि बड़ा बोलनेवाला था। उसने काशिराज अजातशत्रुके पास जाकर कहा—'मैं तुम्हें ब्रह्मका उपदेश करूँ।' उस अजातशत्रुने कहा, इस वचनके लिये मैं आपको सहस्र [ गौएँ ] देता हूँ; लोग 'जनक, जनक' ऐसा कहकर दौड़ते हैं। [ अर्थात् सब लोग यही कहते हैं कि 'जनक बड़ा दानी है, जनक बड़ा श्रोता है'। ये दोनों बातें आपने अपने वचनसे मेरे लिये सुलभ कर दी हैं। इसलिये मैं आपको सहस्र गौएँ देता हूँ ] ॥ १ ॥

| तत्र पूर्वपक्षवादी अविद्याविषय-<br><br>ब्रह्मविद् दृप्तबालाकिः दृप्तो गर्वि-<br><br>तोऽसम्यग्ब्रह्मवित्त्वादेव, बलाकाया<br><br>अपत्यं बालाकिर्दृप्तश्चासौ बाला-<br><br>किश्चेति दृप्तबालाकिः, हशब्द | तहाँ क्वचित्—किसी काल-विशेषमें अविद्याके विषयको ही ब्रह्म जाननेवाला गोत्रतः 'गार्ग्य' पूर्वपक्षवादी दृप्तबालाकि, जो ब्रह्म-को सम्यग्रूपसे न जाननेके कारण ही दृप्त—गरबीला था और बलाकाका पुत्र होनेसे बालाकि कहलाता था; तथा इस प्रकार जो दृप्त और बालाकि होनेसे दृप्तबालाकि नामसे प्रसिद्ध |