बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 415, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 415
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ४०९
स होवाच गार्ग्यो य एवासौ चन्द्रे पुरुष एत-
मेवाहं ब्रह्मोपास इति स होवाचाजातशत्रुर्मा मैत-
स्मिन्संवदिष्ठा बृहन्पाण्डरवासाः सोमो राजेति वा
अहमेतमुपास इति स यए तमेवमुपास्तेऽहरहर्ह सुतः
प्रसुतो भवति नास्यान्नं क्षीयते ॥ ३ ॥
वह गार्ग्य बोला, 'यह जो चन्द्रमामें पुरुष है, इसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ।' उस अजातशत्रुने कहा, 'नहीं, नहीं, इसके विषयमें बात मत करो। यह महान्, शुक्लवस्त्रधारी, सोम राजा है—इस प्रकार मैं इसकी उपासना करता हूँ। जो इसकी इस प्रकार उपासना करता है, उसके लिये नित्यप्रति सोम सुत और प्रस्तुत होता है तथा उसका अन्न क्षीण नहीं होता' ॥ ३ ॥
| संस्कृत-भाष्य | भाषार्थ |
|---|---|
| य एवासौ चन्द्रे मनसि चैकः<br><br>पुरुषो भोक्ता कर्ता चेति पूर्ववद्वि-<br><br>शेषणम् । बृहन् महान् पाण्डरं<br><br>शुक्लं वासो यस्य सोऽयं पाण्डर-<br><br>वासाः, अप्शरीरत्वाच्चन्द्राभिमा-<br><br>निनः प्राणस्य, सोमो राजा चन्द्रः,<br><br>यश्चान्नभूतोऽभिषूयते लतात्मको | यह जो चन्द्रमा और मनमें एक ही पुरुष कर्ता और भोक्ता है—इस प्रकार इसके पूर्ववत् विशेषण समझने चाहिये। [ सूर्यमण्डलसे द्विगुण होनेके कारण ] जो बृहन् अर्थात् महान् है तथा जिसके पाण्डर-शुक्ल वास-वस्त्र हैं, वह यह 'पाण्डरवासाः' है, क्योंकि चन्द्राभिमानी प्राण जलमय शरीरवाला है [ और जलका शुक्ल वर्ण प्रसिद्ध ही है ], सोम राजा चन्द्रमाको कहते हैं तथा जो यज्ञमें पेय अन्नके रूपमें चुवाया जाता है, वह लतामय सोम अर्थात् सोमलता भी सोम है। उस चन्द्रमा एवं लतामय पुरुषको एक करके [ अर्थात् अहंग्रह- |