बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 417, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ४११
| तथा विद्युति त्वचि हृदये चैका देवता। तेजस्वीति विशेषणम्, तस्यास्तत्फलम्—तेजस्वी ह भवति तेजस्विनी हास्य प्रजा भवति। विद्युतां बहुत्वस्याङ्गीकरणादात्मनि प्रजायां च फलबाहुल्यम् ॥ ४ ॥ | इसी प्रकार विद्युत्, त्वचा और हृदयमें भी एक ही देवता है। 'तेजस्वी' यह उसका विशेषण है। उसका यह फल है—वह तेजस्वी होता है और उसकी प्रजा भी तेजस्विनी होती है। विद्युतोंका बाहुल्य अङ्गीकार किया गया है, इसलिये अपने और प्रजाके लिये फलकी बहुलता भी सम्भव है ॥४॥ |
गार्ग्यद्वारा आकाश-ब्रह्मका उपदेश और अजातशत्रुद्वारा उसका प्रत्याख्यान
स होवाच गार्ग्यो य एवायमाकाशे पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति स होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवादिष्ठाः पूर्णमप्रवर्तीति वा अहमेतमुपास इति स य एतमेवमुपास्ते पूर्यते प्रजया पशुभिर्नास्यास्माल्लोकात्प्रजोद्वर्तते ॥ ५ ॥
वह गार्ग्य बोला, 'यह जो आकाशमें पुरुष है, इसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ।' उस अजातशत्रुने कहा, 'नहीं, नहीं, इसके विषयमें बात मत करो। मैं उसकी पूर्ण और अप्रवर्तीरूपसे उपासना करता हूँ। जो कोई इसकी इस प्रकार उपासना करता है, वह प्रजा और पशुओंसे पूर्ण होता है और इस लोकमें उसकी प्रजाका उच्छेद नहीं होता' ॥ ५ ॥
| तथा आकाशे हृद्याकाशे हृदये चैका देवता। पूर्णमप्रवर्ति चेति | इसी प्रकार आकाश, हृदयाकाश और हृदयमें भी एक ही देवता है। उसके 'पूर्ण' और 'अप्रवर्ति' ये दो |