बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 419, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ४१३
| प्रसिद्धेः । उपासनफलमपि—<br><br>जिष्णुर्ह जयनशीलोऽपराजिष्णुर्न च परैर्जितस्वभावो भवति, अन्यतस्त्यजायी अन्यतस्त्यानां सपत्नानां जयनशीलो भवति ॥६॥ | प्रसिद्ध है [ इसलिये उन्हें 'सेना' कहा है ]। उपासनाका फल भी इस प्रकार है—जिष्णु-जयनशील, अपराजिष्णु—दूसरोंसे पराजित न होनेके स्वभाववाला और अन्यतस्त्यजायी—अन्यतस्त्य अर्थात् शत्रुओंको जीतनेवाला होता है ॥ ६ ॥ |
गार्ग्यद्वारा अग्निब्रह्मका प्रतिपादन तथा अजातशत्रुद्वारा उसका प्रत्याख्यान
स होवाच गार्ग्यो य एवायमग्नौ पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति स होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवदिष्ठा विषासहिरिति वा अहमेतमुपास इति स य एतमेवमुपास्ते विषासहिर्ह भवति विषासहिर्हास्य प्रजा भवति ॥ ७ ॥
वह गार्ग्य बोला, 'यह जो अग्निमें पुरुष है, इसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ।' उस अजातशत्रुने कहा, 'नहीं, नहीं, इसके विषयमें बात मत करो। इसकी तो मैं विषासहिरूपसे उपासना करता हूँ। जो कोई इसकी इस प्रकार उपासना करता है, वह निश्चय ही विषासहि होता है और उसकी प्रजा भी विषासहि होती है' ॥ ७ ॥
| अग्नौ वाचि हृदि चैका देवता ।<br><br>तस्या विशेषणम्—विषासहिर्मर्षयिता परेषाम् । अग्निबाहुल्यात् फलबाहुल्यं पूर्ववत् ॥ ७ ॥ | अग्नि, वाक् और हृदय एक ही देवता है । उसका विशेषण है 'विषासहि' अर्थात् दूसरोंको सहन करनेवाला। पूर्ववत् अग्निकी बहुलता होनेके कारण उसके फलकी भी बहुलता है ॥ ७ ॥ |
१. अग्निमें जो हविष्य डाला जाता है उसे वह भस्म करके सहन कर लेता है, इसलिये अग्नि विषासहि—सहन करनेवाला है।