भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

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पृष्ठ 424
४१८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २

| देवता । तस्या विशेषणं मृत्युः । फलं सर्वं पूर्ववत्, मृत्योरनागमनेन रोगादिपीडाभावो विशेषः॥१२॥ | उसका विशेषण मृत्यु है । फल सारा पहलेही¹के समान है, मृत्युके न आने-से रोगादि पीडाका अभाव रहना—इतना विशेष है ॥ १२ ॥ |


गार्ग्यद्वारा देहान्तर्गत ब्रह्मका प्रतिपादन और अजातशत्रुद्वारा उसका प्रत्याख्यान

स होवाच गार्ग्यो य एवायमात्मनि पुरुष एत-
मेवाहं ब्रह्मोपास इति स होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मि-
न्संवदिष्ठा आत्मन्वीति वा अहमेतमुपास इति स य
एतमेवमुपास्त आत्मन्वी ह भवत्यात्मन्विनी हास्य
प्रजा भवति स ह तूष्णीमास गार्ग्यः ॥ १३ ॥

वह गार्ग्य बोला 'यह जो आत्मामें पुरुष है, इसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ।' उस अजातशत्रुने कहा, 'नहीं, नहीं, इसके विषयमें बात मत करो; इसकी तो मैं आत्मन्वीरूपसे उपासना करता हूँ। जो कोई इसकी इस प्रकार उपासना करता है, वह निश्चय आत्मन्वी होता है और उसकी प्रजा भी आत्मन्विनी होती है।' तब वह गार्ग्य चुप हो गया ॥१३॥

| आत्मनि प्रजापतौ बुद्धौ च हृदि चैका देवता । तस्या आत्मन्वी—आत्मवानिति विशेषणम् । फलम्—आत्मन्वी ह भवत्यात्मवान्भवति, आत्मन्विनी हास्य प्रजा भवति । बुद्धिबहुलत्वात्प्रजायां | आत्मामें अर्थात् प्रजापति, बुद्धि और हृदयमें भी एक ही देवता है । उसका 'आत्मन्वी' अर्थात् 'आत्मवान्' यह विशेषण है । फल—आत्मन्वी अर्थात् आत्मवान् होता है' तथा उसकी प्रजा भी आत्मन्विनी होती है । बुद्धियोंकी बहुलता |


१. दशम मन्त्रोक्त फलके समान ।