बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 447, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 447
| ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ४४१ |
|---|
| शाङ्करभाष्य | भाष्यार्थ |
|---|---|
| “सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति” (छा० उ० ६।८।१) इति। लिङ्गोपाधिसम्बन्धकृतं विशेषात्मस्वरूपमुत्सृज्य अविशेषे स्वाभाविके आत्मन्येव केवले वर्तते इत्यभिप्रायः। | केवल भूताकाशमें ही शयन नहीं करता। तात्पर्य यह है कि लिङ्गोपाधिके सम्बन्धसे होनेवाले अपने विशेष रूपको त्यागकर स्वाभाविक अविशेष शुद्ध आत्मामें ही विद्यमान रहता है। |
| यदा शरीरेन्द्रियाध्यक्षतामुत्सृजति, तदासौ स्वात्मनि वर्तत इति कथमवगम्यते ? नामप्रसिद्ध्या। कासौ नामप्रसिद्धिः? इत्याह—तानि वागादेर्विज्ञानानि यदा यस्मिन्काले गृह्णात्यादत्ते अथ तदा हैतत्पुरुषः स्वपिति नाम—एतन्नामास्य पुरुषस्य तदा प्रसिद्धं भवति। गौणमेवास्य नाम भवति स्वमेवात्मानमपीत्यपिगच्छतीति स्वपितीत्युच्यते। | जिस समय यह शरीर और इन्द्रियोंकी अध्यक्षता छोड़ देता है, उस समय स्वात्मामें ही विद्यमान रहता है, यह कैसे जाना जाता है ? —नामकी प्रसिद्धिसे। वह नामकी प्रसिद्धि क्या है ? सो श्रुति बतलाती है—जिस समय यह उन वागादिके विज्ञानोंको ग्रहण कर लेता है, उस समय यह पुरुष 'स्वपिति' नामवाला होता है—उस समय इस पुरुषका यही नाम प्रसिद्ध होता है। यह इसका गुणजनित ही नाम है। यह स्व अर्थात् आत्माको ही अपीति—अपिगच्छति अर्थात् प्राप्त हो जाता है, इसलिये 'स्वपिति' ऐसा कहा जाता है। |
| सत्यं स्वपितीतिनामप्रसिद्ध्या आत्मनः संसारधर्मविलक्षणं रूपमवगम्यते, न त्वत्र युक्तिरस्तीत्याशङ्क्याह—तत्तत्र स्वापकाले | सचमुच, 'स्वपिति' इस नामकी प्रसिद्धिसे तो आत्माका रूप सांसारिक धर्मोंसे विलक्षण जान पड़ता है—परंतु इसमें कोई युक्ति नहीं है—ऐसी आशङ्का करके श्रुति कहती है—उस समय—उस सुषुप्ति-कालमें प्राण |