भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 449, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 449

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थे ४४३


| नास्य शोकमोहादयः सुखदुःखा-<br>दयश्च कार्यकारणसंयोगजनित-<br>भ्रान्त्याध्यारोपिता इति ।<br>न; मृषात्वात् । | इसके शोक-मोहादि तथा सुख-<br>दुःखादि देह और इन्द्रियोंके संयोगसे<br>होनेवाली भ्रान्तिसे आरोपित नहीं<br>हैं।<br>सिद्धान्ती-ऐसी बात नहीं है;<br>क्योंकि स्वप्न मिथ्या होता है। |

स यत्रैतत्स्वप्न्यया चरति ते हास्य लोकास्तदु-<br>तेव महाराजो भवत्युतेव महाब्राह्मण उतेवोच्चावचं<br>निगच्छति स यथा महाराजो जानपदान्गृहीत्वा स्वे<br>जनपदे यथाकामं परिवर्तेतैवमेवैष एतत्प्राणान्गृहीत्वा<br>स्वे शरीरे यथाकामं परिवर्तते ॥ १८ ॥

जिस समय यह आत्मा स्वप्नवृत्तिसे बर्तता है उस समय इसके वे लोक ( कर्मफल ) उदित होते हैं। वहाँ भी यह महाराज होता है या महाब्राह्मण होता है अथवा ऊँची-नीची [ गतियों ] को प्राप्त होता है। जिस प्रकार कोई महाराज अपने प्रजाजनोंको लेकर ( स्वाधीन कर ) अपने देशमें यथेच्छ विचरता है, उसी प्रकार यह प्राणोंको ग्रहणकर अपने शरीरमें यथेच्छ विचरता है ॥ १८ ॥

| स प्रकृत आत्मा यत्र यस्मि-<br>न्काले दर्शनलक्षणया स्वप्न्यया<br>स्वप्नवृत्त्या चरति वर्तते तदा ते<br>हास्य लोकाः कर्मफलानि । के<br>ते ? तत्तत्रोतापि महाराज इव<br>भवति। सोऽयं महाराजत्वमिवास्य<br>लोकः, न महाराजत्वमेव जाग-<br>रित इव । तथा महाब्राह्मण इव, | वह प्रकृत आत्मा जिस समय<br>दर्शनरूपा स्वप्नवृत्तिसे बर्तता है,उस<br>समय उसके वे लोक—कर्मफल<br>उदित होते हैं वे कौन ? तब-उस<br>अवस्थामें भी वह महाराज-सा हो<br>जाता है। उसका वह लोक ( कर्म-<br>फल) महाराजत्वके समान होता है,<br>जागरित अवस्थाकी तरह महाराजत्व<br>ही नहीं होता। इसी प्रकार महा-<br>ब्राह्मणके समान होता है, अथवा |