भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 452, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 452
४४६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २

| नोऽन्यस्य जाग्रत्प्रतिविम्बभूतस्य लोकस्य दर्शनात् । महाराज एव तावद्व्यस्तसुप्तासु प्रकृतिषु पर्यङ्के शयानःस्वप्नान्पश्यन्नुपसंहतकरणः पुनरुपगतप्रकृतिं महाराजमिवात्मानं जागरित इव पश्यति यात्रागतं भुञ्जानमिव च भोगान् । न च तस्य महाराजस्य पर्यङ्के शयनाद् द्वितीयोऽन्यः प्रकृत्युपेतो विषये पर्यटन्नहनि लोके प्रसिद्धोऽस्ति, यमसौ सुप्तः पश्यति । न चोपसंहृतकरणस्य रूपादिमतो दर्शनमुपपद्यते । न च देहे देहान्तरस्य तत्तुल्यस्य सम्भवोऽस्ति, देहस्थस्यैव हि स्वप्नदर्शनम् । | क्योंकि उस अवस्था में आत्मा से भिन्न जाग्रत्काल का प्रतिबिम्बभूत कर्मफल देखा जाता है । उस समय जिसकी इन्द्रियाँ आत्मामें लीन रहती हैं, वह पलंग पर सोया हुआ महाराज ही, अन्य सब सेवकों के जहाँ-तहाँ सोते रहने पर स्वप्न देखता हुआ अपने को जागरितअवस्था के समान पुनः सेवकादि से युक्त महाराज के समान यात्रा में जाते हुए तथा भोग भोगते हुए देखता है । उस महाराज के पलंग पर शयन करनेवाले देह के अतिरिक्त सेवकादिके सहित देशमें भ्रमण करनेवाला कोई अन्य देह दिन में नहीं देखा जाता, जिसे वह स्वप्नावस्था में देखता हो । तथा जिसकी इन्द्रियाँ लीन हो गयी हैं ऐसे उस सुप्त शरीर को रूपादिमान् पदार्थों का दर्शन होना भी सम्भव नहीं है । देहके भीतर भी उसके समान किसी अन्य देहका होना सम्भव नहीं है और स्वप्नदर्शन देहस्थ जीवको ही होता है । | | ननु पर्यङ्के शयानः पथि प्रवृत्तमात्मानं पश्यति—न बहिः स्वप्नान्पश्यतीत्येतदाह—स महाराजो जानपदाञ्जनपदे भवान्राजोपकर- | मगर पलंगपर सोनेवाला देह ही तो अपने को [ देहसे बाहर ] मार्ग में चलता हुआ देखता है ? ऐसी आशङ्का करके कहते हैं, नहीं; वह शरीर से बाहर स्वप्न नहीं देखता—इसी विषय में श्रुतिका यह कथन है—वह महाराज जानपदों—जनपद ( देश ) में रहनेवाले राजाके |