भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 455, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 455

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४४९


शाङ्करभाष्यभाष्यार्थ
अथ यदा सुषुप्तो भवति--यदा स्वप्नयया चरति, तदाप्ययं विशुद्ध एव। अथ पुनर्यदा हित्वा दर्शनवृत्तिं स्वप्नं यदा यस्मिन्काले सुषुप्तः सुष्ठु सुप्तः सम्प्रसादं स्वाभाव्यं गतो भवति--सलिलमिवान्यसम्बन्धकालुष्यं हित्वा स्वाभाव्येन प्रसीदति। कदा सुषुप्तो भवति ? यदा यस्मिन्काले न कस्यचन न किञ्चनेत्यर्थः, वेद विजानाति; कस्यचन वा शब्दादेः सम्बन्धि वस्त्वन्तरं किञ्चन न वेदेत्यध्याहार्यम्; पूर्वं तु न्याय्यम्, सुप्ते तु विशेषविज्ञानाभावस्य विवक्षितत्वात्।'अथ यदा सुप्तो भवति'—जिस समय स्वप्नवृत्तिसे बर्तता है उस समय भी यह विशुद्ध ही होता है। इसके पश्चात् जब दर्शनवृत्तिरूप स्वप्नको त्याग कर जिस समय सुषुप्त—सम्यक् प्रकारसे सुप्त अर्थात् सम्प्रसाद—स्वाभाविक अवस्थाको प्राप्त हुआ होता है—जलके समान अन्य वस्तुके सम्बन्धसे प्राप्त हुई मलिनताको त्यागकर स्वभावतः प्रसन्न होता है। वह सुषुप्त कब होता है ?—जिस समय वह किसीके विषयमें नहीं अर्थात् कुछ भी नहीं जानता, अथवा कस्यचन—किसी शब्दादिके सम्बन्धवाली किसी अन्य वस्तुको नहीं जानता—ऐसा अध्याहार करना चाहिये। इनमें पहला अर्थ ही उचित है; क्योंकि यहाँ सोये हुए पुरुषके विशेष विज्ञानका अभाव बतलाना ही अभीष्ट है।
एवं तावद्विशेषविज्ञानाभावे सुषुप्तो भवतीत्युक्तम्। केन पुनः क्रमेण सुषुप्तो भवति? इत्युच्यते—इस प्रकार यहाँतक यह बतलाया गया कि विशेष विज्ञानके अभावमें पुरुष सुषुप्त होता है। वह किस क्रमसे सुषुप्त होता है, सो अब बतलाया जाता है—
हिता नाम हिता इत्येवंनाम्न्योहिता नाम—'हिता' इस नामवाली जो नाडियाँ अर्थात् अन्नके

बृ० उ० २६—