भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 468, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 468
४६२बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय २
ऽस्ति, विज्ञानमयस्यैव हि प्रकरणम्। समानप्रकरणे च श्रुत्यन्तरे कौषीतकिनामादित्यादिपुरुषान्प्रस्तुत्य "स होवाच यो वै बालाक एतेषां पुरुषाणां कर्ता यस्य वैतत्कर्म स वै वेदितव्यः" (कौ० उ० ४।१९) इति प्रबुद्धस्यैव विज्ञानमयस्य वेदितव्यतां दर्शयति, नार्थान्तरस्य।नहीं गया है और यह विज्ञानमयका ही प्रकरण है। इसके समान प्रकरणमें ही कौषीतकी-शाखावालोंकी एक अन्य श्रुतिमें आदित्यादि-पुरुषोंका प्रकरण उठाकर श्रुति "वह बोला, हे बालाके ! जो भी इन पुरुषोंका कर्त्ता है और जिसका यह जगद्रूप कर्म है वही निश्चय ज्ञातव्य है" इस प्रकार जगे हुए विज्ञानमयकी ही ज्ञातव्यता प्रदर्शित करती है, किसी अन्य वस्तुकी नहीं।
तथा च "आत्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति" (२।४।५) इत्युक्त्वा, य एवात्मा प्रियः प्रसिद्धस्तस्यैव द्रष्टव्यश्रोतव्यमन्तव्यनिदिध्यासितव्यतां दर्शयति। तथा च विद्योपन्यासकाले "आत्मेत्येवोपासीत" (१।४।७) "तदेतत्प्रेयः पुत्रात्प्रेयो वित्तात्" (१।४।८) "तदात्मानमेवावेदहं ब्रह्मास्मि" (१।४।१०) इत्येवमादिवाक्यानामानुलोम्यं स्यात्पराभावे। वक्ष्यति च— "आत्मानं चेद्विजानीयादयमस्मीति पूरुषः (४।४।१२) इति।इसी प्रकार "आत्माके लिये ही सब कुछ प्रिय होता है" ऐसा कहकर श्रुति यह दिखाती है कि जो आत्मा प्रियरूपसे प्रसिद्ध है, वही द्रष्टव्य, श्रोतव्य, मन्तव्य और निदिध्यासितव्य है। इस तरह यदि कोई विज्ञानमयसे भिन्न ज्ञातव्य न होगा, तभी आत्मज्ञानकी व्याख्या करते समय "आत्मा है—इस प्रकार उपासना करे" "वह यह आत्मा पुत्रसे प्रिय है और धनसे भी प्रिय है" तथा "उसने आत्माको ही जाना कि मैं ब्रह्म हूँ" इत्यादि वाक्योंकी अनुकूलता हो सकती है। श्रुति आगे "यदि पुरुष आत्माको 'मैं यह हूँ' इस प्रकार जान जाय" ऐसा कहेगी भी।