बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 485, कुल 1402 में से
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| ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ४७९ |
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| संस्कृत-भाष्यम् | भाष्यार्थ |
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| नोत्पत्त्यादिभेदप्रतिपादनपराः। सैन्धवघनवत्प्रज्ञप्त्येकरसनैरन्तर्यावधारणात् "एकधैवानुद्रष्टव्यम्" (४।४।२०) इति च। यदि च ब्रह्मणश्चित्रपटवद्वृक्षसमुद्रादिवच्चोत्पत्त्याद्यनेकधर्मविचित्रता विजिग्राहयिषिता, एकरसं सैन्धवघनवदनन्तरमबाह्यमिति नोपसमहरिष्यत्, 'एकधैवानुद्रष्टव्यम्' इति च न प्रायोक्ष्यत्— "य इह नानेव पश्यति" (४।४।१९) इति निन्दावचनं च। तस्मादेकरूपैकत्वप्रत्ययदार्ढ्यायैव सर्ववेदान्तेषूत्पत्तिस्थितिलयादिकल्पना, न तत्प्रत्ययकरणाय। | उत्पत्ति आदिका भेद प्रदर्शित करनेके लिये नहीं हैं। तथा "उसे एकरूप ही देखना चाहिये" इस श्रुतिसे नमकके डलेके समान उसे ज्ञानरूप एकरससे निरन्तर परिपूर्ण भी निश्चय किया गया है। यदि चित्रपट अथवा वृक्ष या समुद्रादिके समान उत्पत्ति आदि अनेक धर्मोंके कारण ब्रह्मकी विचित्रताका ही ग्रहण करना अभीष्ट होता तो 'वह नमकके डलेके समान एकरस एवं अन्तरबाह्यशून्य है' इस प्रकार उपसंहार न किया जाता तथा उसे "एकरूप ही देखना चाहिये" ऐसे आदेशका और "जो इसे नानावत् देखता है [ वह मृत्युसे मृत्युको प्राप्त होता है ]" ऐसे निन्दासूचक वचनका भी प्रयोग न होता। अतः समस्त वेदान्तोंमें जो उत्पत्ति, स्थिति एवं लय आदिकी कल्पना है, वह ब्रह्मकी एकरूपताके ज्ञानकी दृढ़ताके लिये ही है, उन ( उत्पत्त्यादि ) की प्रतीति करानेके लिये नहीं है। |
| न च निरवयवस्य परमात्मनोऽसंसारिणः संसार्येकदेशकल्पना न्याय्या, स्वतोऽदेशत्वात्परमात्मनः। अदेशस्य परस्य एकदेश- | इसके सिवा निरवयव और असंसारी परमात्माके संसारीरूप एक देशकी कल्पना करना युक्तियुक्त भी नहीं है, क्योंकि स्वयं परमात्मामें तो देश है नहीं। देशहीन परमात्माके |