भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 497, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 497
ब्राह्मण १ ]शाङ्करभाष्यार्थ४९१
रासद्वस्तुविषयमिति न प्रवर्तते; यथा काम्येषु ।असद्वस्तुसे सम्बन्ध है, इसलिये उनका विधान न करता हो—ऐसी बात नहीं है, जैसा कि काम्य-कर्मों के विषयमें भी देखा गया है।
न च पुरुषा न प्रवर्तेरन्नविद्यावन्तः, दृष्टत्वाद्यथा कामिनः ।अविद्यावान् पुरुषोंकी उन कर्मोंमें प्रवृत्ति न होती हो—ऐसी बात भी नहीं है; क्योंकि सकाम पुरुषोंके समान उन्हें भी प्रवृत्त होते देखा ही गया है।
विद्यावतामेव कर्माधिकार इति चेत् ?पूर्व०—कर्मका अधिकार तो विद्वानोंको ही है—ऐसा कहें तो ?
न, ब्रह्मैकत्वविद्यायां कर्माधिकारविरोधस्योक्तत्वात् । एतेन ब्रह्मैकत्वे निर्विषयत्वादुपदेशेन तद्ग्रहणफलाभावदोषपरिहार उक्तो वेदितव्यः ।सिद्धान्ती—नहीं, क्योंकि ब्रह्मकी एकताके ज्ञानमें कर्माधिकारका विरोध तो बतलाया जा चुका है। इसीसे यह जान लेना चाहिये कि ब्रह्मकी एकता सिद्ध होनेपर कोई विषय न रहनेके कारण कर्मकाण्डके उपदेशसे उसका ग्रहणरूप फल नहीं हो सकता—इस दोषका परिहार बतला दिया गया है।
पुरुषेच्छा रागादिवैचित्र्याच्च—<br><br>अनेका हि पुरुषाणामिच्छाः, रागादयश्च दोषा विचित्राः; ततश्च बाह्यविषयरागाद्यपहृतचेतसो न शास्त्रं निवर्तयितुं शक्तम्; नापि स्वभावतो बाह्यविषयविरक्त-पुरुषोंकी इच्छा एवं रागादिका भेद रहनेके कारण भी [कर्मकाण्डके उपदेशकी सार्थकता सिद्ध होती है]। पुरुषोंकी अनेकों इच्छाएँ हैं और रागादि तरह-तरहके दोष हैं, अतः जिनका चित्त बाह्य विषयोंके रागसे आकर्षित है, उन्हें उससे निवृत्त करनेमें शास्त्र समर्थ नहीं है। इसी तरह जिनका चित्त स्वभावसे ही बाह्य विषयोंसे विरक्त है, उनको