भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 499, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 499

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४९३


| ५।२।१) इत्यादिः। तस्मान्न ब्रह्मैकत्वं ज्ञापयिष्यन्तो वेदान्ता विधिशास्त्रस्य बाधकाः। न च विधिशास्त्रमेतावता निर्विषयं स्यात्। नाप्युक्तकारकादिभेदं विधिशास्त्रमुपनिषदां ब्रह्मैकत्वं प्रति प्रामाण्यं निवर्तयति। स्वविषयशूराणि हि प्रमाणानि, श्रोत्रादिवत्। <br><br> [ब्रह्मैकत्वमाक्षिप्यते] <br> तत्र पण्डितम्मन्याः केचित्स्वचित्तवशात्सर्वं प्रमाणितरेतरविरुद्धं मन्यन्ते, तथा प्रत्यक्षादिविरोधमपि चोदयन्ति ब्रह्मैकत्वे— <br><br> शब्दादयः किल श्रोत्रादिविषया भिन्नाः प्रत्यक्षत उपलभ्यन्ते, ब्रह्मैकत्वं ब्रुवतां प्रत्यक्षविरोधः स्यात्; तथा श्रोत्रादिभिः शब्दा- | इत्यादि अर्थवाद भी है। अतः ब्रह्मकी एकताको सूचित करनेवाले वेदान्तवाक्य विधि-शास्त्रके बाधक नहीं हैं। इतनेहीसे विधिशास्त्र निर्विषय नहीं हो सकता और न उपर्युक्त कारकादि भेदवाला विधिशास्त्र ब्रह्मकी एकताके प्रति उपनिषदोंके प्रामाण्यको ही निवृत्त कर सकता है; क्योंकि श्रोत्रादि इन्द्रियोंके समान सब प्रमाण अपने-अपने विषयमें प्रबल होते हैं। <br><br> यहाँ अपनेको पण्डित माननेवाले कोई-कोई पुरुष [शास्त्रगम्य ऐक्यको स्वीकार करनेपर] अपनी बुद्धिके अनुसार समस्त प्रमाणोंको एक-दूसरेके विरुद्ध समझते हैं तथा ब्रह्मकी एकता माननेमें प्रत्यक्षादि प्रमाणोंके विरोधकी भी शङ्का करते हैं— <br><br> श्रोत्रादि इन्द्रियोंके विषयभूत जो शब्दादि हैं, वे तो प्रत्यक्ष ही भिन्न-भिन्न उपलब्ध होते हैं। अतः ब्रह्मकी एकता बतलानेवाले वाक्योंका प्रत्यक्ष प्रमाणसे विरोध सिद्ध होता है। इसी प्रकार श्रोत्रादि- |


१. प्रजापतिके तीन पुत्र देवता, मनुष्य और दानव प्रजापतिसे उपदेश ग्रहण करनेके लिये गये। प्रजापतिने उन तीनोंको 'द', 'द', 'द' ऐसा कहकर एक ही शब्दसे उपदेश किया। उन तीनोंने अपनी-अपनी प्रकृतिके अनुसार उसके 'दमन करो', 'दान करो' और 'दया करो' ये तीन अर्थ कर लिये। इस प्रकार यह अर्थवाद इस उपनिषदके पञ्चम अध्याय द्वितीय ब्राह्मणमें है।

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