भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 509, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 509
ब्राह्मण २]शाङ्करभाष्यार्थ५०३
संस्कृत-भाष्यभाष्यार्थ
कुर्वन्ति, तेन ते द्वेष्टारो भ्रातृव्याः। प्रत्यगात्मेक्षणप्रतिषेधकरत्वात्। काठके चोक्तम्—"पराञ्चि खानि व्यतृणत्स्वयम्भूस्तस्मात्पराङ्पश्यति नान्तरात्मन्" इत्यादि। (२।१।१) तत्र यः शिश्वादीन्वेद, तेषां याथात्म्यमवधारयति, स एतान् भ्रातृव्यानवरुणद्ध्यपावृणोति विनाशयति।विषयोन्मुख करते हैं, अतः वे द्वेष करनेवाले भ्रातृव्य हैं; कारण, वे प्रत्यगात्मदर्शनको रोकनेवाले हैं। कठोपनिषद्‌में भी कहा है—"स्वयम्भू परमात्माने इन्द्रियोंको बहिर्मुख करके हिंसित कर दिया है, इसलिये जीव बाह्य विषयोंको देखता है, अन्तरात्माको नहीं देखता" इत्यादि। सो, जो कोई इन शिशु आदिको जानता है, इनके यथार्थ स्वरूपका निश्चय करता है, वह इन भ्रातृव्योंका अवरोध-अपावरण अर्थात् विनाश कर देता है।
तस्मै फलश्रवणेनाभिमुखीभूतायाह—अयं वाव शिशुः। कोऽसौ? योऽयं मध्यमः प्राणः, शरीरमध्ये यः प्राणो लिङ्गात्मा, यः पञ्चधा शरीरमाविष्टः—बृहन्पाण्डरवासः सोम राजन्नित्युक्तः, यस्मिन्वाङ्मनःप्रभृतीनि करणानि विषक्तानि-पड्‌वीशशङ्कुनिदर्शनात्; स एष शिशुरिव, विषयेष्वितरकरणवदपटुत्वात्;इस प्रकार फलश्रवणसे अभिमुख हुए उस (गार्ग्य) से [अजातशत्रु] कहता है—निश्चय यही शिशु है। यह कौन? जो यह मध्यम प्राण है। शरीरके मध्यमें जो यह लिङ्गात्मा प्राण है, जो पाँच प्रकारसे शरीरमें प्रविष्ट होकर बृहन्, पाण्डरवास, सोम और राजन् इन नामोंसे कहा जाता है, जिसमें वाणी और मन आदि इन्द्रियाँ विशेषरूपसे निबद्ध हैं, जैसा कि घोड़ेके पैर बाँधनेके मेखोंके दृष्टान्तसे बतलाया गया है; वह यह प्राण शिशुके समान अन्य इन्द्रियोंकी तरह विषयोंमें पटु न होनेके कारण शिशु है।
शिशुं साधानमित्युक्तम्। किं पुनस्तस्य शिशोर्वत्सस्थानीयस्यमूल मन्त्रमें 'शिशुं साधानम्' ऐसा कहा गया है। सो उस वत्सस्थानीय