भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 520, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 520
५१४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २
संस्कृत-भाष्यम्हिन्दी-अनुवाद
तत्त्वात् ‘नेति नेति’ इति निर्दिश्यते।अद्वैत होनेके कारण उसका ‘नेति-नेति’ इस प्रकार निर्देश किया जाता है।
तत्र यदपोहद्वारेण ‘नेति नेति’ इति निर्दिश्यते ब्रह्म, ते एते द्वे वाव—वावशब्दावधारणार्थः—द्वे एवेत्यर्थः—ब्रह्मणः परमात्मनो रूपे—रूप्यते याभ्याम्—रूपं परं ब्रह्म अविद्याध्यारोप्यमाणाभ्याम्। के ते द्वे ? मूर्तं चैव मूर्तमेव च। तथाऽमूर्तं चाऽमूर्तमेव चेत्यर्थः। अन्तर्णीतस्वात्मविशेषणे मूर्तामूर्ते द्वे एवेत्यवधार्यते।इस प्रकार जिनके अपवादद्वारा ब्रह्मका ‘नेति-नेति’ इस प्रकार निर्देश किया जाता है वे उस परब्रह्म परमात्माके ये दो रूप हैं। यहाँ ‘वाव’ शब्द निश्चयार्थक है। अर्थात् अविद्याद्वारा आरोप किये जानेवाले जिन रूपोंके द्वारा अरूप परब्रह्म निरूपित होता है, वे ये दो ही रूप हैं। वे दो रूप कौन-से हैं ? ‘मूर्तं चैव’—मूर्त ही तथा ‘अमूर्तं च’—अमूर्त ही [वे रूप हैं]। अर्थात् जिनमें उनके अपने अन्य विशेषणोंका अन्तर्भाव हो जाता है, ऐसे ब्रह्मके ये मूर्त और अमूर्त दो ही रूप निश्चय किये जाते हैं।
कानि पुनस्तानि विशेषणानि मूर्तामूर्तयोः ? इत्युच्यन्ते—मर्त्यं च मर्त्यं मरणधर्मि, अमृतं च तद्विपरीतम्, स्थितं च—परिच्छिन्नं गतिपूर्वकं यत्स्थास्नु, यच्च—यातीति यत्—व्यापि—अपरिच्छिन्नं स्थितविपरीतम्, सच्च—सदित्यन्येभ्योविशेष्यमाणा-किंतु मूर्त और अमूर्तके वे अन्य विशेषण कौन-से हैं ? सो बतलाये जाते हैं—‘मर्त्यं च,’ मर्त्य—मरणधर्मी और अमृत—मर्त्यसे विपरीत स्वभाववाला, स्थित—परिच्छिन्न अर्थात् जो गतिपूर्वक स्थित रहनेवाला है और यत्—जो जाता हो अर्थात् व्यापक, अपरिच्छिन्न यानी स्थितसे विपरीत स्वभाववाला, सत्—दूसरोंकी अपेक्षा विशेषरूपसे निरूपित किये जाने-