भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 533, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 533
ब्राह्मण ३ ]शाङ्करभाष्यार्थ५२७

| कल्पनया साङ्ख्यचित्तमनुवर्तन्ते । <br><br> सर्वमेतत्तार्किकैः सह सामञ्ज- <br><br> तन्निरसनम् स्वकल्पनया रमणीयं <br><br> पश्यन्ति, नोपनिषत्सिद्धान्तं <br><br> सर्वंन्यायविरोधं च पश्यन्ति; <br><br> कथम्? उक्ता एव तावत्सावयवत्वे परमात्मनःसंसारित्वसव्रणत्वकर्मफलदेशसंसरणानुपपत्त्यादया दोषाः; नित्यभेदे च विज्ञानात्मनः परेणैकत्वानुपपत्तिः । <br><br> लिङ्गमेवेति चेत्परमात्मन <br><br> उपचारितदेशत्वेन कल्पितं घट- <br><br> करकभूच्छिद्राकाशादिवत्, तथा <br><br> लिङ्गवियोगेऽपि परमात्मदेशा- <br><br> श्रयणं वासनायाः । अविद्यायाश्च <br><br> स्वत उत्थानम् ऊषरवत्-इत्यादि- | कल्पनासे वे सांख्यमतावलम्बियोंके चित्तका भी अनुसरण करते हैं। <br><br> तार्किकोंके साथ सामञ्जस्यकी कल्पना करके वे इस सारी व्यवस्थाको रमणीय मानते हैं, किंतु औपनिषदसिद्धान्तको तथा सब प्रकारकी युक्तियोंसे आनेवाले विरोधको नहीं देखते। सो किस प्रकार ? परमात्माका सावयवत्व स्वीकार करनेपर उसमें संसारित्व, सच्छिद्रत्व तथा कर्मफलभोगके स्थानमें उत्पन्न होनेकी अनुपपत्ति आदि दोष बतलाये ही गये हैं। और यदि उनमें भेद माना जाय तो विज्ञानात्माका परमात्माके साथ अभेद होना सम्भव नहीं है। <br><br> और यदि यह कहो कि घटाकाश, करकाकाश और भूच्छिद्राकाशादिके समान लिङ्गशरीर ही परमात्माके औपचारिक एक देशरूपसे कल्पित है [अर्थात् लिङ्गरूप उपाधिसे कल्पित जो परमात्माका अंश है, वही जीवात्मा है] तो ऐसी अवस्थामें लिङ्गदेहका वियोग होनेपर भी वासना परमात्माके एक देशको आश्रित कर लेगी<sup></sup> तथा 'ऊसर भूमिके समान अविद्याका स्वयं ही उदय हुआ है' |


१. स्वप्न आदि अवस्थाओंमें लिङ्गदेहका वियोग होनेपर जीवात्मामें वासना नहीं रह सकती; क्योंकि लिङ्गका अभाव हो जानेपर उसके अधीन रहनेवाले जीवका भी अभाव हो जाना सम्भव है। अतः लिङ्गका अभाव होनेपर जीवमें वासना रहती है—यह प्रक्रिया असंगत होगी; इसलिये यह मत ठीक नहीं है।