भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 535, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 535
ब्राह्मण ३ ]शाङ्करभाष्यार्थ५२९
संस्कृत मूल (भाष्य)हिन्दी भाष्यार्थ
यदा तु मूर्तामूर्ते तज्जनितवासनाश्च मूर्तामूर्ते द्वे रूपे, ब्रह्म च रूपि तृतीयम्, न चान्यच्चतुर्थमन्तराले—तदा एतदनुकूलमवधारणम्, द्वे एव ब्रह्मणो रूपे इति; अन्यथा ब्रह्मैकदेशस्य विज्ञानात्मनो रूपे इति कल्प्यम्, परमात्मनो वा विज्ञानात्मद्वारेणेति। तदा च रूपे एवेति द्विवचनमसमञ्जसम्, रूपाणीति वासनाभिः सह बहुवचनं युक्ततरं स्यात्—द्वे च मूर्तामूर्ते वासनाश्च तृतीयमिति।मूर्तामूर्त और तज्जनित वासनाएँ ये मूर्त और अमूर्त दो रूप हों और उनसे रूपवान् ब्रह्म तीसरा रूप हो तथा इनके बीचमें कोई चौथा रूप न हो, उसी समय ऐसा निश्चय करना ठीक होगा कि ब्रह्मके दो ही रूप हैं; नहीं तो ऐसा मानना होगा कि ये ब्रह्मके एक देश विज्ञानात्माके ही रूप हैं अथवा विज्ञानात्माके द्वारा परमात्माके रूप हैं। उस समय भी 'रूपे' ऐसा द्विवचनान्त प्रयोग उचित नहीं होगा, अपितु वासनाओंके साथ त्रित्व होनेके कारण 'रूपाणि' ऐसा बहुवचनान्त प्रयोग अधिक उचित होगा; अर्थात् दो तो मूर्त और अमूर्त एवं तीसरा रूप वासनाएँ।
अथ मूर्तामूर्ते एव परमात्मनो रूपे, वासनास्तु विज्ञानात्मन इति चेत्—तदा विज्ञानात्मद्वारेण विक्रियमाणस्य परमात्मनः—इतीयं वाचोयुक्तिरनर्थिका स्यात्, वासनाया अपि विज्ञानात्मद्वारत्वस्य अविशिष्टत्वात्; न च वस्तु वस्त्वन्तरद्वारेण विक्रियत इति मुख्यया वृत्त्या शक्यं कल्पयितुम्;यदि कहो कि परमात्माके रूप तो मूर्त और अमूर्त दो ही हैं, वासनाएँ तो विज्ञानात्माकी है तो उस अवस्था में [मूर्तामूर्तके विषयमें] ऐसी वाचोयुक्ति प्रदर्शित करना कि ये विज्ञानात्माके द्वारा विकारको प्राप्त होते हुए परमात्माके रूप हैं, व्यर्थ ही होगा, क्योंकि विज्ञानात्माका द्वारत्व तो वासनाओंके लिये भी ऐसा ही है। इसके सिवा एक वस्तु किसी अन्य वस्तुके द्वारा विकारको प्राप्त होती है—ऐसी मुख्यवृत्तिसे कल्पना

बृ० उ० ३४—