बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 537, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ब्राह्मण ३ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ५३१ |
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| नैवम्, विज्ञानमयस्यारूपित्वेन विजिज्ञापयिषितत्वात्; यदि हि तस्यैव विज्ञानमयस्यैतानि माहारजनादीनि रूपाणि स्युस्तस्तस्यैव 'नेति नेति' इत्यनाख्येयरूपतयादेशो न स्यात्। | सिद्धान्ती-ऐसी बात नहीं है, क्योंकि विज्ञानमयको अरूपवान्-रूपसे बतलाना अभीष्ट है। यदि ये माहारजनादिरूप उस विज्ञानमयके ही हों तो उसीका 'नेति-नेति' इस प्रकार अनिर्वचनीयरूपसे आदेश नहीं किया जा सकता। | | नन्वन्यस्यैवासावादेशो न तु विज्ञानमयस्येति ? | पूर्व०-किंतु यह आदेश तो किसी औरका ही है, विज्ञानमयका नहीं है? | | न, षष्ठान्ते उपसंहारात्—"विज्ञातारमरे केन विजानीयात्" इति विज्ञानमयं प्रस्तुत्य "स एष नेति नेति" (४।५।१५) इति; "विज्ञापयिष्यामि" इति च प्रतिज्ञाता अर्थवत्त्वात्। यदि च विज्ञानमयस्यैव असंव्यवहार्यमात्मस्वरूपं ज्ञापयितुमिष्टं स्यात्प्रध्वस्तसर्वोपाधिविशेषम्, तत इयं प्रतिज्ञार्थवती स्यात्—येनासौ ज्ञापितो जानात्यात्मानमेवाहं ब्रह्मास्मीति, शास्त्रनिष्ठां प्राप्नोति न बिभेति कुतश्चन। | सिद्धान्ती-नहीं, क्योंकि, "अरे मैत्रेयि! विज्ञाताको किसके द्वारा जाने" इस प्रकार [विज्ञानमयरूप-से] आरम्भ करके छठे अध्यायके अन्तमें "वह यह आत्मा ऐसा नहीं है, ऐसा नहीं है" इस प्रकार उपसंहार किया है तथा ऐसा माननेपर ही "विशेषरूपसे ज्ञान कराऊँगा" यह प्रतिज्ञा भी सार्थक हो सकती है। यहाँ यदि विज्ञानमयके ही सर्वोपाधिविनिर्मुक्त व्यवहारातीत आत्मस्वरूपका ज्ञान कराना अभीष्ट होगा तभी यह प्रतिज्ञा सार्थक हो सकेगी, जिसका ज्ञान कराये जाने-पर यह अपनेहीको 'मैं ब्रह्म हूँ' ऐसा जानता और शास्त्रनिष्ठाको प्राप्त करता है तथा किसीसे भी भयको प्राप्त नहीं होता। |
१. अर्थात् उपनिषद्के चौथे अध्यायमें।