बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 543, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 543
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थे ५३७
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| षिद्धद्वयाद्ब्रह्म तन्न निर्दिष्टम्, कीदृशं नु खलु—इत्याशङ्का न निवर्त्तिष्यते; तथा चानर्थकश्च स निर्देशः, पुरुषस्य विविदिषाया अविवर्त्तकत्वात्; 'ब्रह्म ज्ञापयिष्यामि' इति च वाक्यम् अपरिसमाप्तार्थं स्यात् । | ब्रह्म है, उसका निर्देश नहीं हुआ; 'वह कैसा है' इस आशङ्काकी निवृत्ति नहीं होगी; ऐसी स्थितिमें पुरुषकी जिज्ञासाका निवर्त्तक न होनेके कारण वह निर्देश भी निरर्थक होगा; और 'मैं तुझे ब्रह्मका ज्ञान कराऊँगा' इस वाक्यका प्रयोजन भी अपूर्ण रह जायगा। |
| यदा तु सर्वदिक्कालादिविविदिषा निवर्तिता स्यात् सर्वोपाधिनिराकरणद्वारेण तदा सैन्धवघनवदेकरसं प्रज्ञानघनमनन्तरमबाह्यं सत्यस्य सत्यमहं ब्रह्मास्मीति सर्वतो निवर्त्तते विविदिषा, आत्मन्येवावस्थिता प्रज्ञा भवति । तस्माद्वीप्सार्थं नेति नेतीति नकारद्वयम् । | किंतु जिस समय सम्पूर्ण दिशा और कालादिसम्बन्धिनी जिज्ञासा निवृत्त हो जाती है, उस समय समस्त उपाधियोंके निराकरणद्वारा 'मैं लवणखण्डके समान एक रस, प्रज्ञानघन, अन्तरबाह्यशून्य और सत्यका सत्यरूप ब्रह्म हूँ' ऐसा बोध होता है। अतः सब प्रकारसे जिज्ञासाकी निवृत्ति हो जाती है और आत्मामें ही बुद्धि निश्चल हो जाती है; इसलिये 'नेति नेति' ये दो नकार वीप्साके लिये ही हैं। |
| ननु महता यत्नेन परिकरबन्धं कृत्वा किं युक्तमेवं निर्देष्टुं ब्रह्म ? | पूर्व०-तो क्या बड़े प्रयत्नसे कमर कसकर ब्रह्मका इस प्रकार निरूपण करना उचित है ? |
| बाढम्; | सिद्धान्ती-हाँ। |
| कस्मात् ? | पूर्व०-कैसे ? |
| न हि–यस्मात्, 'इति न, इति | सिद्धान्ती-'न हि'—क्योंकि 'न' पदसे अर्थात् 'इति न, इति न' इस |