भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 566, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 566
५५८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २

| स यथा—आर्द्रेन्धाग्नेः, आर्द्रैरेधोभिरिद्धोऽग्निरार्द्रेन्धाग्निः, तस्मात्, अभ्याहितात्पृथग्धूमाः, पृथग्, नानाप्रकारम्, धूमग्रहणं विस्फुलिङ्गादिप्रदर्शनार्थम्, धूमविस्फुलिङ्गादयो विनिश्चरन्ति विनिर्गच्छन्ति । | वह [चौथा दृष्टान्त-] जिस प्रकार आर्द्रेन्धा अग्निसे–जो आर्द्र (गीले) ईंधनसे बढ़ाया गया हो उसे आर्द्रेन्धाग्नि कहते हैं। उस आधान किये हुए अग्निसे जैसे पृथक् धूआं निकलता है, पृथक् यानी नाना प्रकारका धूआँ। यहाँ 'धूम' शब्दका ग्रहण चिनगारी आदिको प्रदर्शित करनेके लिये है। अर्थात् धूम और चिनगारी आदि निकलते हैं। | | एवम्— यथायं दृष्टान्तः, अरे मैत्रेय्यस्य परमात्मनः प्रकृतस्य महतो भूतस्य निश्वसितमेतत्, निश्वसितमिव निश्वसितम्; यथा अप्रयत्नेनैव पुरुषनिश्वासो भवत्येवं वा अरे। | इसी प्रकार जैसा कि यह दृष्टान्त है, हे मैत्रेयि ! इस परमात्मा यानी प्रकृत महद्भूतका यह निःश्वसित है अर्थात् निःश्वसितके समान निःश्वसित है; जिस प्रकार बिना प्रयत्नके ही पुरुषका निःश्वास होता है, अरे ! उसी प्रकार [उस विज्ञानघनसे यह जगत् उत्पन्न हुआ है]। | | किं तन्निश्वसितमिव ततो जातमित्युच्यते—यदृग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वाङ्गिरसः— चतुर्विधं मन्त्रजातम्, इतिहास इत्युर्वशीपुरूरवसोः संवादादिः—"उर्वशी हाप्सराः" इत्यादिब्राह्मणमेव, पुराणम् "असद्वा इदमग्र आसीत्" (तै० उ० २।६।१) इत्यादि, विद्या देवजनविद्या वेदः सोऽयमित्याद्या, उपनिषदः "प्रि- | उससे निःश्वासके समान क्या उत्पन्न हुआ है ? जो यह ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद चार प्रकारका मन्त्रसमुदाय है तथा इतिहास यानी उर्वशी-पुरूरवाका संवादादि "उर्वशी हाप्सराः" इत्यादि ब्राह्मण ही इतिहास है, पुराण–"आरम्भमें यह असत् ही था" इत्यादि, विद्या–'वेदः सोऽयम्' इत्यादि देवजनविद्या, |

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