भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 571, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 571

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५६३


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
विषयसामान्यमात्रे, त्वग्विषय इव स्पर्शविशेषाः; प्रविष्टं तद्व्यतिरेकेणाभावभूतं भवति; एवं मनोविषयोऽपि बुद्धिविषयसामान्यमात्रे प्रविष्टस्तद्व्यतिरेकेणाभावभूतो भवति; विज्ञानमात्रमेव भूत्वा प्रज्ञानघने परे ब्रह्मण्यप इव समुद्रे प्रलीयते।सामान्यमात्ररूप मनःसंकल्पमें प्रविष्ट होकर उससे पृथक् सत्ताशून्य हो जाता है इसी तरह मनका विषय भी बुद्धिके सामान्य विषयमात्रमें प्रवेश करके उससे पृथक् नहीं रहता तथा विज्ञानमात्र ही होकर समुद्रमें जलके समान प्रज्ञानघन परब्रह्ममें लीन हो जाता है।
एवं परम्पराक्रमेण शब्दादौ सह ग्राहकेण करणेन प्रलीने प्रज्ञानघने उपाध्यभावात्सैन्धवघनवत् प्रज्ञानघनमेकरसमनन्तमपारं निरन्तरं ब्रह्म व्यवतिष्ठते। तस्मादात्मैव एकमद्वयमिति प्रतिपत्तव्यम्।इस प्रकार परम्पराक्रमसे अपने ग्राहक इन्द्रियके सहित शब्दादिके प्रज्ञानघनमें लीन हो जानेपर कोई उपाधि न रहनेके कारण लवणखण्डके समान एकरस, अनन्त, अपार, अखण्ड, प्रज्ञानघन ब्रह्म ही रह जाता है। अतः एकमात्र अद्वितीय आत्मा ही है—ऐसा जानना चाहिये।
तथा सर्वेषां गन्धानां पृथिवीविशेषाणां नासिके घ्राणविषयसामान्यम्, तथा सर्वेषां रसानाम्-अब्-विशेषाणां जिह्वेन्द्रियविषयसामान्यम्, तथा सर्वेषां रूपाणां तेजोविशेषाणां चक्षुश्चक्षुर्विषयसामान्यम्, तथा शब्दानां श्रोत्रविषयसामान्यं पूर्ववत्। तथा श्रोत्रादिविषयसामान्यानां मनोविषयसामान्ये संकल्पे; मनो-इसी प्रकार पृथिवीके विशेषरूप समस्त गन्धोंका नासिकाएँ—घ्राणसम्बन्धी विषयसामान्य, जलके विशेषरूप समस्त रसोंका रसनेन्द्रियसम्बन्धी विषयसामान्य, तेजके विशेषरूप समस्त रूपोंका चक्षु—चक्षुसम्बन्धी विषयसामान्य और पहलेहीकी तरह शब्दोंका श्रोत्रसम्बन्धी विषयसामान्य आश्रय है। इसी प्रकार श्रोत्रादि विषयसामान्योंका मनके विषयसामान्यरूप संकल्पमें, मनके विषय-