भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 576, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 576
५६८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २
मापन्नासि, मर्त्या जन्ममरणाशनायापिपासादिंसंसारधर्मवत्यसि, नामरूपकार्यात्मिका—अमुष्यान्वयाहमिति, स खिल्यभावस्तव कार्यकरणभूतोपाधिसम्पर्कभ्रान्तिजनितो महति भूते स्वयोनौ महासमुद्रस्थानीये परमात्मनि अजरेऽमरेऽभये शुद्धे सैन्धवघनवदेकरसे प्रज्ञानघनेऽनन्तेऽपारे निरन्तरेऽविद्याजनितभ्रान्तिभेदवर्जिते प्रवेशितः ।<br><br>तस्मिन्प्रविष्टे स्वयोनिग्रस्ते खिल्यभावेऽविद्याकृते भेदभावे प्रणाशिते—इदमेकमद्वैतं महद्भूतम् महच्च तद् भूतं च महद्भूतं सर्वमहत्तरत्वादाकाशादिकारणत्वाच्च ।<br><br>भूतं त्रिष्वपि कालेषु स्वरूपाव्यभिचारात्सर्वदैव परिनिष्पन्नमिति त्रैकालिको निष्ठाप्रत्ययः ।<br><br>अथवा भूतशब्दः परमार्थवाची, महच्च पारमार्थिकंमरणधर्मवाली, जन्म, मरण, क्षुधा और पिपासा आदि सांसारिक धर्मोंवाली एवं मैं नामरूपकार्यात्मिका और अमुक वंशमें उत्पन्न हुई हूँ—ऐसे भाववाली हो गयी है। देहेन्द्रियजनित उपाधिके सम्पर्कसे भ्रान्तिके कारण उत्पन्न हुआ तेरा वह खिल्यभाव अपने कारण महासमुद्रस्थानीय अजर, अमर, अभय, शुद्ध, सैन्धवघनके समान एकरस, प्रज्ञानघन, अनन्त, अपार, अखण्ड एवं अविद्याजनित भ्रान्तिमय भेदसे रहित परमात्मामें प्रविष्ट कर दिया गया है।<br><br>उसमें प्रविष्ट होनेपर उस खिल्यभावके अपने कारणद्वारा लीन कर लिये जानेपर अविद्याजनित भेदभावका नाश हो जानेसे यह एक अद्वैत महद्भूत ही रहता है। महान् भूत होनेसे वह महद्भूत कहलाता है; क्योंकि आकाशादिका कारण होनेसे वह सबसे महान् है। तीनों ही कालोंमें उसके स्वरूपका व्यभिचार नहीं होता, वह सर्वदा ही ज्यों-का-त्यों रहता है, इसलिये भूत है। 'भूत' शब्दमें 'त' यह निष्ठाप्रत्यय त्रैकालिक है।<br><br>अथवा 'भूत' शब्द परमार्थवाची है। अर्थात् वह महत् है और