बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 578, कुल 1402 में से
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| ५७० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २ |
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| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
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| एतेभ्यो भूतेभ्यो यान्येतानि कार्यकारणविषयाकारपरिणतानि नामरूपात्मकानि सलिलफेनबुद्बुदोपमानि स्वच्छस्य परमात्मनः सलिलोपमस्य, येषां विषयपर्यन्तानां प्रज्ञानघने ब्रह्मणि परमार्थविवेकज्ञानेन प्रविलापनमुक्तं नदीसमुद्रवत्—एतेभ्यो हेतुभूतेभ्यो भूतेभ्यः सत्यशब्दवाच्येभ्यः समुत्थाय सैन्धवखिल्यवत्—यथा अद्भ्यः सूर्यचन्द्रादिप्रतिबिम्बः, यथा वा स्वच्छस्य स्फटिकस्य अलक्तकाद्युपाधिभ्यो रक्तादिभावः, एवं कार्यकारणभूतभूतोपाधिभ्यो विशेषात्मखिल्यभावेन समुत्थाय सम्यगुत्थाय—येभ्यो भूतेभ्य उत्थितः तानि यदा कार्यकारणविषयाकारपरिणतानि भूतान्यात्मनो विशेषात्मखिल्यहेतुभूतानि शास्त्राचार्योपदेशेन ब्रह्मविद्यया नदीसमुद्रवत्प्रविलापितानि विनश्यन्ति, सलिलफेनबुद्बुदादिवत्तेषु विनश्यत्सु अन्वेवैष विशेषात्मखिल्यभावो | इन भूतोंसे—ये जो देह और इन्द्रियरूप विषयके आकारमें परिणत जलके फेन और बुद्बुदोंके समान जलस्थानीय स्वच्छ परमात्माके नामरूपमय विकार हैं; जिनके सम्पूर्ण विषयोंतकका, समुद्रमें नदीके समान, पारमार्थिक विवेकज्ञानसे प्रज्ञानघन ब्रह्ममें लय होना बतलाया गया है, इन सबके हेतुभूत सत्य शब्दवाच्य भूतोंसे लवणखण्डके समान उत्पन्न होकर—जिस प्रकार जलसे सूर्य-चन्द्रादिका प्रतिबिम्ब अथवा जैसे अलक्तक (महावर) आदि उपाधियोंके कारण स्वच्छ स्फटिकका रक्तादि भाव हो जाता है, इसी प्रकार देहेन्द्रियरूप भूतोंकी उपाधियोंके कारण विशेषात्मरूप खिल्यभावसे समुत्थित अर्थात् सम्यक् प्रकारसे उत्पन्न होकर जिन भूतोंसे यह उत्पन्न हुआ है, वे देह और इन्द्रियोंके आकारमें परिणत एवं आत्माके खिल्यभावरूप विशेषत्वके हेतुभूत भूत जिस समय शास्त्र और आचार्यके ब्रह्मविद्याके उपदेशसे समुद्रमें नदीके समान लीन होते हुए नाशको प्राप्त होते हैं, जलमें फेन और बुद्बुदोंके समान उनके नाश होनेके साथ ही यह विशेषात्मरूप खिल्यभाव भी नष्ट हो जाता है। |