बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 588, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ५८० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| तस्मादात्मा द्रष्टव्यः । स च श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्य इति च दर्शनप्रकारा उक्ताः । | इसलिये आत्माका साक्षात्कार करना चाहिये। तथा उसीका श्रवण, मनन और निदिध्यासन करना चाहिये—ये उसके साक्षात्कारके प्रकार बतलाये गये हैं। | | तत्र श्रोतव्य आचार्यागमाभ्याम्, मन्तव्यस्तर्कतः । तत्र च तर्क उक्तः ‘आत्मैवेदं सर्वम्’ इति प्रतिज्ञातस्य हेतुवचनमात्मैकसामान्यत्वम् आत्मैकोद्भवत्वम् आत्मैकप्रलयत्वं च । | इनमें आत्माका श्रवण तो आचार्य और शास्त्रके द्वारा करना चाहिये और मनन तर्कसे करना चाहिये। इसमें तर्क यह बतलाया है कि जहाँ 'यह सब आत्मा ही है' ऐसी प्रतिज्ञा की है, उसमें एकमात्र आत्माका ही सबमें सामान्यरूपसे विद्यमान रहना, एक आत्मासे ही सबका उत्पन्न होना और एक आत्मामें ही सबका लीन होना—ये उसके हेतु बतलाये गये हैं। | | तत्रायं हेतुरसिद्ध इत्याशङ्क्यत आत्मैकसामान्योद्भवप्रलयाख्यः । तदाशङ्कानिवृत्त्यर्थमेतद्ब्राह्मणमारभ्यते । | यहाँ यह शङ्का की जाती है कि यह जो एक आत्माका ही सबमें समानरूपसे रहना, उसीसे सबका उत्पन्न होना एवं उसीमें लय होनारूप हेतु है, वह असिद्ध है। इस आशङ्काकी निवृत्तिके लिये यह ब्राह्मण आरम्भ किया जाता है। | | यस्मात्परस्परोपकार्योपकारकभूतं जगत्सर्वं पृथिव्यादि; यच्च लोके परस्परोपकार्योपकारकभूतं तदेककारणपूर्वकम् एकसामा- | क्योंकि यह पृथिवी आदि सारा जगत् परस्पर उपकार्य और उपकारकरूप हैं तथा लोकमें जो भी पदार्थ परस्पर उपकार्य-उपकारक-रूप होते हैं, वे एक कारणपूर्वक, |