बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 595, कुल 1402 में से
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ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५८७
आत्मा है' [ इस वाक्यसे कहा गया है ] । यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है ॥ ५ ॥
| तथा आदित्यो मधु । चाक्षुषोऽध्यात्मम् ॥ ५ ॥ | इसी प्रकार आदित्य मधु है । चाक्षुष पुरुष अध्यात्ममधु है ॥ ५ ॥ |
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इमा दिशः सर्वेषां भूतानां मध्वासामं दिशाँ सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमासु दिक्षु तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मँ श्रौत्रः प्रातिश्रुत्कस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदँ सर्वम् ॥ ६ ॥
ये दिशाएँ समस्त भूतोंका मधु हैं तथा समस्त भूत इन दिशाओंके मधु हैं । यह जो इन दिशाओंमें तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्म श्रोत्रसम्बन्धी प्रातिश्रुत्क तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि 'यह आत्मा है' [ इस वाक्यसे कहा गया है ] । यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है ॥ ६ ॥
| तथा दिशो मधु । दिशां यद्यपि श्रोत्रमध्यात्मम्, शब्दप्रति- <br><br> श्रवणवेलायां तु विशेषतः संनि- <br><br> हितो भवतीत्यध्यात्मं प्रातिश्रुत्कः- <br><br> प्रतिश्रुत्कायां प्रतिश्रवणवेलायां <br><br> भवः प्रातिश्रुत्कः ॥ ६ ॥ | इसी प्रकार दिशाएँ मधु हैं । यद्यपि श्रोत्र दिशाओंका अध्यात्म परिणाम है तो भी शब्दश्रवणके समय श्रोत्रपुरुष विशेषतः श्रोत्रोंके समीप रहता है, इसलिये वह अध्यात्म प्रातिश्रुत्क है । जो प्रतिश्रुत्कमें अर्थात् प्रत्येक श्रवणवेलामें रहता है, उसे प्रातिश्रुत्क कहते हैं ॥ ६ ॥ |
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