भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

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पृष्ठ 602
५९४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २

पुरुषो यश्चायमात्मा तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव
स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदँ सर्वम् ॥ १४ ॥

यह आत्मा(देह) समस्त भूतोंका मधु है तथा समस्त भूत इस आत्माके मधु हैं। यह जो इस आत्मामें तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह आत्मा तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि 'यह आत्मा है' [इस वाक्यसे कहा गया है]। यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है ॥ १४ ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
अयमात्मा सर्वेषां भूतानां मधु।यह आत्मा (देह) समस्त भूतोंका मधु है।
नन्वयं शारीरशब्देन निर्दिष्टः पृथिवीपर्याय एव ।**शङ्का—**किंतु यह तो 'शारीर' शब्दसे बतलाया हुआ पृथिवीका पर्याय ही है।^१
न; पार्थिवांशस्यैव तत्र ग्रहणात्। इह तु सर्वात्मा प्रत्यस्तमिताध्यात्मधिभूताधिदैवादिसर्वविशेषः सर्वभूतदेवतागणविशिष्टः कार्यकरणसङ्घातः सः 'अयमात्मा' इत्युच्यते । तस्मिन्नस्मिन्नात्मनि तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽमूर्तरसः सर्वात्मको निर्दिश्यते ।<br><br>एकदेशेन तु पृथिव्यादिषु निर्दिष्टः, अत्राध्यात्मविशेषाभावात् स न निर्दिश्यते ।**समाधान—**नहीं, क्योंकि वहाँ तो केवल पार्थिव अंशका ही ग्रहण किया गया है; किंतु यहाँ जो सर्वात्मा है, जिसमें अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैवादि सब प्रकारके विशेषका अभाव है, जो समस्त भूत और देवगणसे विशिष्ट है तथा भूत और इन्द्रियोंका संघात है, वही यहाँ 'यह आत्मा' ऐसा कहा गया है। उस इस आत्मामें तेजोमय अमृतमय पुरुष सर्वात्मक अमूर्तरस ही बताया गया है। पृथिवी आदिमें तो अध्यात्मपुरुषका एकदेशरूपसे निर्देश किया है, किंतु यहाँ कोई अध्यात्मविशेष न होनेके कारण उसका निर्देश नहीं

१. अतः इसका पुनः उल्लेख करनेसे पुनरुक्ति दोष आता है !