भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 605, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 605

ब्राह्मण ५] शाङ्करभाष्यार्थ ५९७


संस्कृतहिन्दी
ब्रह्मविद्ब्रह्मैव सन्ब्रह्माभवत्, सर्वः स सर्वमभवत् ।को नष्ट कर वह ब्रह्मवेत्ता ब्रह्म होते हुए ही ब्रह्म और सर्वरूप होते हुए ही सर्व हो गया है।
परिसमाप्तः शास्त्रार्थो यदर्थः प्रस्तुततः । तस्मिन्नेतस्मिन् सर्वात्मभूते ब्रह्मविदि सर्वात्मनि सर्वं जगत् समर्पितमित्येतस्मिन्नर्थ दृष्टान्त उपादीयते—तद्यथा रथनाभौ च रथनेमौ चाराः सर्वे समर्पिता इति प्रसिद्धोऽर्थः, एवमेवास्मिन्नात्मनि परमात्मभूते ब्रह्मविदि सर्वाणि भूतानि ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तानि, सर्वे देवा अग्न्यादयः, सर्वे लोका भूरादयः, सर्वे प्राणा वागादयः, सर्व एत आत्मानो जलचन्द्रवत् प्रतिशरीरानुप्रवेशिनोऽविद्याकल्पिताः, सर्वं जगदस्मिन् समर्पितम् ।जिसके लिये यह प्रकरण आरम्भ किया गया था वह शास्त्रका तात्पर्य समाप्त हो गया । उस इस सबके आत्मभूत सर्वात्म ब्रह्मवेत्तामें सारा जगत् समर्पित है, इस अर्थमें यह दृष्टान्त दिया जाता है—जिस प्रकार यह बात प्रसिद्ध है कि रथकी नाभि और रथकी नेमिमें सारे अरे समर्पित हैं, उसी प्रकार इस परमात्मभूत ब्रह्मवेत्ता आत्मामें ब्रह्मासे लेकर स्तम्बपर्यन्त समस्त भूत, अग्नि आदि समस्त देव, भूर्लोक आदि समस्त लोक, वाक् आदि समस्त प्राण तथा जलमें प्रतिबिम्बित चन्द्रके समान प्रत्येक शरीरमें प्रवेश करनेवाले ये अविद्याकल्पित समस्त आत्मा समर्पित हैं। अभिप्राय यह है कि सारा जगत् इसीमें समर्पित है।
(ब्रह्मविदः सर्वात्मोपपादनम्)<br>यदुक्तं ब्रह्मविद्वामदेवः प्रतिपेदे—'अहं मनुरभवं सूर्यश्च' (१।४।१०) इति, स एष सर्वात्मभावो व्याख्यातः। स एष विद्वान् ब्रह्मवित् सर्वोपाधिः सर्वात्मा सर्वोपहले जो श्रुतिने कहा था कि ब्रह्मवेत्ता वामदेवने जाना 'मैं मनु हुआ और सूर्य भी' वहाँ कहे हुए इस सर्वात्मभावकी यह व्याख्या हुई है। वह यह विद्वान् ब्रह्मवेत्ता सर्वोपाधि, सर्वात्मा और सर्वरूप हो जाता है।