बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 609, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ६०१ |
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| मुपनीतं भवति—यथादित्य उद्यञ्छार्वरं तमोऽपनयतीति तद्वत्। | है। जिस प्रकार उदय होनेवाला सूर्य रात्रिके अन्धकारको दूर कर देता है, उसी प्रकार [ उदय होनेवाली विद्या अविद्याका नाश कर देती है]। | | अपि चैवं स्तुता ब्रह्मविद्या— | इसके सिवा उस ब्रह्मविद्याकी इस प्रकार भी स्तुति की गयी है | | या इन्द्ररक्षिता सा दुष्प्राप्या देवैरपि; यस्मादश्विभ्यामपि देवभिषग्भ्यामिन्द्ररक्षिता विद्या महतायासेन प्राप्ता। ब्राह्मणस्य शिरश्छित्त्वाऽश्व्यं शिरः प्रतिसन्धाय तस्मिन्निन्द्रेणच्छिन्ने पुनः स्वशिर एव प्रतिसन्धाय तेन ब्राह्मणस्य स्वशिरसवोक्ताशेषा ब्रह्मविद्या श्रुता। तस्मात्ततः परतरं किञ्चित् पुरुषार्थसाधनं न भूतं न भावि वा, कुत एव वर्तमानम्, इति नातः परा स्तुतिरस्ति। | कि जो इन्द्रसे सुरक्षिता थी, वह देवताओंके लिये भी दुष्प्राप्य हो रही थी; क्योंकि वह इन्द्ररक्षिता विद्या देववैद्य अश्विनीकुमारोंको भी बड़ी कठिनतासे प्राप्त हुई थी। उन्होंने ब्राह्मणका शिर काटकर उसपर घोड़ेका शिर लगाया और जब उसे इन्द्रने काट दिया तो पुनः उनका अपना शिर जोड़कर फिर ब्राह्मणके उस अपने शिरसे ही कहे जानेपर समग्र ब्रह्मविद्याका श्रवण किया। अतः उससे बढ़कर कोई अन्य पुरुषार्थका साधन न कभी हुआ है और न होगा ही, फिर वर्तमान तो हो ही कैसे सकता है; अतः इससे बढ़कर उसकी स्तुति नहीं हो सकती है। | | अपि चैवं स्तूयते ब्रह्मविद्या— | इसके सिवा ब्रह्मविद्याकी इस प्रकार भी स्तुति की जाती है—यह | | सर्वपुरुषार्थानां कर्म हि साधनमिति लोके प्रसिद्धम्। तच्च कर्म वित्तसाध्यम्, तेनाशापि नास्त्यमृत- | लोकमें प्रसिद्ध है कि समस्त पुरुषार्थोंका साधन कर्म ही है। वह कर्म धनसाध्य है, अतः उससे तो अमृतत्वकी आशा भी नहीं है। यह |