बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 615, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ब्राह्मण ५ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ६०७ |
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| नन्वश्विनोः स्तुत्यर्थौ कथमिमौ मन्त्रौ स्यातां निन्दावचनौ हीमौ। | **शङ्का-**किंतु ये दोनों मन्त्र अश्विनीकुमारोंकी स्तुतिके लिये कैसे हो सकते हैं, ये तो उनकी निन्दाको ही बतलानेवाले हैं ? | | नैष दोषः; स्तुतिरेवैषा, न निन्दावचनौ । यस्मादीदृशमप्यतिक्रूरं कर्म कुर्वतोर्युवयोनँ लोम च मीयत इति । न चान्यत्किञ्चिद्धीयत एवेति । स्तुतावेतौ भवतः । निन्दां प्रशंसां हि लौकिकाः स्मरन्ति। तथा प्रशंसारूपा च निन्दा लोके प्रसिद्धा । | **समाधान-**यह दोष नहीं है; यह उनकी स्तुति ही है, ये मन्त्र निन्दावाचक नहीं हैं; क्योंकि ऐसा क्रूर कर्म करनेपर भी तुम दोनोंका बाल भी बाँका नहीं होता और न तुम्हारी दूसरी ही कोई हानि हो रही है। अतः ये उनकी स्तुतिमें ही हैं ! लौकिक पुरुष कहीं प्रशंसाको निन्दा मानते हैं, इसी प्रकार लोकमें प्रशंसारूपा निन्दा भी प्रसिद्ध है । | | दध्यङनाम आथर्वणः। हेत्यनर्थको निपातः। यन्मधु कक्ष्यमात्मज्ञानलक्षणमाथर्वणो वां युवाभ्यामश्वस्य शीर्षणा शिरसा प्र यत् ईम् उवाच यत् प्रोवाच मधु। ईमित्यनर्थको निपातः ॥१६॥ | दध्यङ् नामके आथर्वणने—यहाँ 'ह' निरर्थक निपात है—जिस आत्मज्ञानरूप कक्ष्य—मधुका तुम्हें घोड़ेके शिरसे 'प्र यत् ईम् उवाच' प्रवचन किया था अर्थात् जिस मधुका उपदेश किया था। यहाँ 'ईम्' यह निरर्थक निपात है ॥ १६ ॥ |
इदं वै तन्मधु दध्यङ्ङाथर्वणोऽश्विभ्यामुवाच । तदेतदृषिः पश्यन्नवोचत् । आथर्वणायाश्विनौ दधीचेऽश्व्यꣳ शिरः प्रत्यैरयतम् । स वां मधु प्रवोचदृतायन्त्वाष्ट्रं यदस्रावपि कक्ष्यं वामिति ॥ १७ ॥