भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 617, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 617

ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६०९


| यन् यत् पूर्वं प्रतिज्ञातं सत्यं तत् परिपालयितुमिच्छन् । जीवितादपि हि सत्यधर्मपरिपालना गुरुतरेत्येतस्य लिङ्गमेतत् ।<br><br>किं तन्न प्रवोचत् ? इत्युच्यते—त्वाष्ट्रम्, त्वष्टा आदित्यस्तस्य सम्बन्धि, यज्ञस्य शिरश्छिन्नं त्वष्टामभवत्, तत्प्रतिसन्धानार्थं प्रवर्ग्यं कर्म । तत्र प्रवर्ग्यकर्माङ्गभूतं यद् विज्ञानं तत्त्वाष्ट्रं मधु—यज्ञस्य शिरश्छेदनप्रतिसन्धानादिविषयं दर्शनं तत्त्वाष्ट्रं यन्मधु हे दस्रौ, दस्राविति परबलानामुपक्षपयितारौ शत्रूणां वा हिंसितारौ, अपि च न केवलं त्वाष्ट्रमेव मधु कर्मसम्बन्धि युवाभ्यामवोचत्, अपि च कक्ष्यं गोप्यं रहस्यं परमात्मसम्बन्धि यद् विज्ञानं मधु मधुब्राह्मणेनोक्तमध्यायद्वयप्रकाशितम्, तच्च वां युवाभ्यां प्रवोचदित्यनुवर्तते ॥ १७ ॥ | 'ऋतायन्'—जो पहले प्रतिज्ञा किया हुआ सत्य था, उसका पालन करनेके लिये । यह इस बातका सूचक है कि सत्यधर्मका पालन जीवनसे भी बढ़कर है ।<br><br>उसने किस मधुका उपदेश किया ? सो कहा जाता है—त्वाष्ट्र मधुका । त्वष्टा सूर्यको कहते हैं, उससे सम्बन्ध रखनेवाले मधुका । यज्ञका शिर काटे जानेपर वह त्वष्टा हो गया, उसके प्रतिसन्धान (जोड़ने) के लिये प्रवर्ग्य कर्म है । वहाँ प्रवर्ग्यकर्मका अङ्गभूत जो विज्ञान है, वही त्वाष्ट्र मधु है । यज्ञके शिरश्छेदनके प्रतिसन्धानादिसे सम्बद्ध जो दर्शन है, वही त्वाष्ट्र मधु है । हे दस्रौ ! दस्र अर्थात् परपक्षकी सेनाका क्षय करनेवाले अथवा शत्रुओंके हिंसको ! इसके सिवा उन्होंने तुम्हें केवल कर्मसम्बन्धी त्वाष्ट्र मधुका ही उपदेश नहीं किया, अपितु कक्ष्य—गोप्य अर्थात् जो परमात्मसम्बन्धी रहस्यभूत मधु विज्ञान था, जिसका मधुब्राह्मणद्वारा वर्णन किया गया है और जो [ तृतीय और चतुर्थ ] दो अध्यायोंमें प्रकाशित किया गया, उसका भी तुम्हें उपदेश किया । यहाँ प्रवोचत् (उपदेश किया) इस क्रियापदकी अनुवृत्ति होती है । १७ ॥ |


वृ० उ० ३६—

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