भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 634, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 634
६२४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

| ता गा होदाचकारोत्कालितवानाचार्यगृहं प्रति । | ज्ञाता सिद्ध होता है।^१ तब वह उन गौओंको आचार्य याज्ञवल्क्यके घरकी ओर ले चला। | | याज्ञवल्क्येन ब्रह्मिष्ठपणस्वीकरणेन आत्मनो ब्रह्मिष्ठता प्रतिज्ञाता, इति ते ह चुक्रुधुः क्रुद्धवन्तो ब्राह्मणाः । तेषां क्रोधाभिप्रायमाचष्टे—कथं नोऽस्माकं एकैकप्रधानानां ब्रह्मिष्ठोऽस्मीति ब्रवीतेति । | याज्ञवल्क्यने ब्रह्मिष्ठसम्बन्धी पण स्वीकार करके अपनी ब्रह्मिष्ठताकी प्रतिज्ञा की है—इससे वे ब्राह्मण क्रुद्ध हो गये। श्रुति उनके क्रोधका अभिप्राय बतलाती है—हममेंसे एक-एक प्रधान ब्राह्मणके सामने वह 'मैं ब्रह्मिष्ठ हूँ' ऐसा कैसे कहता है—इससे वे क्रुद्ध हो गये। | | अथ हैवं क्रुद्धेषु ब्राह्मणेषु जनकस्य यजमानस्य होता ऋत्विगश्वलो नाम बभूव आसीत् । स एनं याज्ञवल्क्यम्, ब्रह्मिष्ठाभिमानी राजाश्रयत्वाच्च धृष्टः, याज्ञवल्क्यं पप्रच्छ पृष्टवान् । कथम् ? त्वं नु खलु नो याज्ञवल्क्य ब्रह्मिष्ठोऽसी३ इति । प्लुतिर्भर्त्सनार्था। | तब इस प्रकार क्रुद्ध हुए ब्राह्मणोंमें यजमान जनकका होता जो अश्वल था, वह इस याज्ञवल्क्यसे बोला—राजाश्रयके कारण अभिमानी और धृष्ट होनेसे उसने याज्ञवल्क्यसे पूछा। किस प्रकार पूछा—'याज्ञवल्क्य ! क्या निश्चय हम सबमें तुम्हीं ब्रह्मिष्ठ हो ?' यहाँ 'असि' पदमें प्लुत ईकारका प्रयोग भर्त्सना (धिक्कारने) के लिये है। | | स होवाच याज्ञवल्क्यः—नमस्कुर्मो वयं ब्रह्मिष्ठाय, इदानीं गोकामाः स्मो वयमिति । तं | उस याज्ञवल्क्यने कहा—'ब्रह्मिष्ठको हम नमस्कार करते हैं, इस समय तो हम गौओंकी इच्छा- |


१. याज्ञवल्क्य यजुर्वेदी है, उससे ब्रह्मचारी सामवेदका श्रवण ( अध्ययन ) करता है। साम ऋग्वेदमें आरूढ होकर ही गान किया जाता है, तथा अथर्ववेद इन तीन वेदोंके ही अन्तर्भूत है; इसलिये इस कथनसे याज्ञवल्क्य चारों वेदोंका ज्ञाता सिद्ध होता है।