भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 65, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 65

ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थ ५९

संस्कृत (शाङ्करभाष्य)हिन्दी (भाष्यार्थ)
न, अनियमात्। न हि विनाशमात्रप्रयत्नादेव घटाद्यभिव्यक्तिर्नियता। तमआद्यावृते घटादौ प्रदीपाद्युत्पत्तौ प्रयत्नदर्शनात्।सिद्धान्ती—ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि यह नियम नहीं है। आवरणके विनाशमात्रका प्रयत्न करनेसे ही घटादिकी उत्पत्ति हो जायगी—ऐसा कोई नियम नहीं है; क्योंकि अन्धकारादिसे आवृत घटादिके प्रकाशके लिये प्रदीप आदिकी उत्पत्तिमें प्रयत्न देखा जाता है।
सोऽपि तमोनाशायैवेति चेत् ? दीपाद्युत्पत्तावपि यः प्रयत्नः सोऽपि तमस्तिरस्करणाय तस्मिन्नष्टे घटः स्वयमेवोपलभ्यते। न हि घटे किञ्चिदाधीयते इति चेत् ?पूर्व०--किंतु वह प्रयत्न भी तो अन्धकारनाशके लिये ही होता है। दीपकादिकी उत्पत्तिके लिये जो प्रयत्न किया जाता है, वह भी अन्धकारकी निवृत्तिके ही लिये होता है; उसकी निवृत्ति होनेपर घट स्वयं ही दिखायी देने लगता है। इससे घटमें कोई बात बढ़ायी नहीं जाती-ऐसा मानें तो ?
न, प्रकाशवतो घटस्योपलभ्यमानत्वात्। यथा प्रकाशविशिष्टो घट उपलभ्यते प्रदीपकरणे न तथा प्राक्प्रदीपकरणात्। तस्मान्न तमस्तिरस्कारायैव प्रदीपकरणं किं तर्हि ? प्रकाशवत्त्वाय। प्रकाशवत्त्वेनैवोपलभ्यमानत्वात्। क्वचि-सिद्धान्ती--ऐसी बात नहीं है, क्योंकि प्रकाशयुक्त घटकी ही उपलब्धि होती है। जिस प्रकार दीपक तैयार करनेपर प्रकाशयुक्त घटकी उपलब्धि होती है, उस प्रकार दीपक तैयार होनेसे पूर्व उसकी उपलब्धि नहीं होती। अतः अन्धकारकी निवृत्तिके लिये ही दीपक नहीं जलाया जाता, तो और किसलिये जलाया जाता है ? प्रकाशके लिये, क्योंकि प्रकाशयुक्त होनेपर ही वस्तुकी उपलब्धि होती है। कहीं-