भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 662, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 662
६५२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

संस्कृतहिन्दी
न्मोक्षो वक्तव्य इत्यत इदमारभ्यते। <br><br> न च जानीमो विषयसन्धात्रि- <br> वान्तरालेऽवस्थानमर्धजरतीयं कौ- <br> शलम् । यत्तु मृत्योरतिमुच्यत <br> इत्युक्त्वा ग्रहातिग्रहावुच्येते, तच्च- <br> र्थसम्बन्धात् । सर्वोऽयं साध्य- <br> साधनलक्षणो बन्धः, ग्रहातिग्रहा- <br> विनिर्मोक्षात् । निगडे हि निर्ज्ञाते <br> निगडितस्य मोक्षाय यत्नः कर्तव्यो <br> भवति; तस्मात्तदर्थ्येनारम्भः ।बतलाना है, इसलिये आगेका ग्रन्थ आरम्भ किया जाता है। जैसे जाग्रत्-स्वप्न आदि दो विषयोंकी सन्धिमें स्थित होना असम्भव है, उसी प्रकार वैदिक कर्मोंसे न बन्धन होता है न मोक्ष, अपितु बीचकी अवस्था प्राप्त होती है-ऐसी कल्पना भी असङ्गत है, अतः हम इस प्रकार अर्धजरतीय व्याख्या करनेकी युक्ति नहीं जानते।¹ यहाँ जो मृत्युसे अतिमुक्त हो जाता है-ऐसा कहकर ग्रह और अतिग्रहका वर्णन किया जाता है, वह तो अर्थके सम्बन्धसे है, यह सब साध्य-साधनरूप बन्धन है; क्योंकि उसके द्वारा ग्रह और अतिग्रहसे उसकी मुक्ति नहीं होती। बन्धनका ज्ञान होनेपर ही उसमें बँधे हुए पुरुषका उससे मुक्त होनेके लिये यत्न करना आवश्यक होता है; अतः मोक्षके लिये ही इसका आरम्भ हुआ है।

ग्रह और अतिग्रहकी संख्या एवं स्वरूप

अथ हैनं जारत्कारव आर्तभागः पप्रच्छ याज्ञ- वल्क्येति होवाच कति ग्रहाः कत्यतिग्रहा इति । अष्टौ ग्रहा अष्टावतिग्रहा इति ये तेऽष्टौ ग्रहा अष्टावतिग्रहाः कतमे त इति ॥ १ ॥


१. जैसे आधी गाय बूढ़ी हो जाय और आधी जवान रहकर बच्चा देती रहे। यह अर्धजरतीय कल्पना असम्भव है, उसी प्रकार कर्मकाण्ड साक्षात् मोक्ष या बन्धनका नहीं, दोनोंके बीचकी स्थितिका कारण है—ऐसा अर्थ भी असंगत ही है।