बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 664, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ६५४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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| सङ्ख्येयविषयप्रश्न इति के ग्रहाः केऽतिग्रहा इति प्रष्टव्यं न तु कति ग्रहाः कत्यतिग्रहा इति प्रश्नः। | जाय तो संख्येयविषयक प्रश्न होगा। ऐसी दशामें 'ग्रह कौन हैं और अतिग्रह कौन हैं' इस प्रकार प्रश्न करना चाहिये। 'ग्रह कितने हैं और अतिग्रह कितने हैं।' ऐसा प्रश्न नहीं। | | अपि च निर्ज्ञातसामान्यकेषु विशेषविज्ञानाय प्रश्नो भवति— यथा कतमेऽत्र कठाः कतमेऽत्र कालापा इति। न चात्र ग्रहातिग्रहा नाम पदार्थाः केचन लोके प्रसिद्धाः, येन विशेषार्थः प्रश्नः स्यात्। | इसके सिवा, जिनके सामान्य स्वरूपका ज्ञान होता है, उन्हींके विशेषरूप जाननेके लिये ऐसा प्रश्न हुआ करता है, जिस प्रकार [ ये ब्राह्मण कठशाखा और कलापशाखाके हैं-ऐसा सामान्य ज्ञान होनेपर ] यह प्रश्न हो सकता है कि 'इनमें कठशाखाके कौन-से हैं और कलापशाखाके कौन-से हैं ?' किंतु यहाँ ग्रह और अतिग्रह नामवाले कोई पदार्थ लोकमें प्रसिद्ध नहीं हैं, जिससे कि उनके विशेष ज्ञानके लिये प्रश्न किया जाय। | | ननु च 'अतिमुच्यते' इत्युक्तम्, ग्रहगृहीतस्य हि मोक्षः; 'स मुक्तिः सातिमुक्तिः' इति हि द्विरुक्तम्, तस्मात्प्राप्ता ग्रहा अतिग्रहाश्च। | किंतु पहले 'अतिमुच्यते'—अतिमुक्त होता है—ऐसा कहा गया है और मुक्ति ग्रहगृहीतकी ही होती है; और वहाँ 'वह मुक्ति है, वह अतिमुक्ति है' इस प्रकार दो बार कहा है, इससे ग्रह और अतिग्रह दोनोंहीकी प्राप्ति होती है। | | ननु तत्रापि चत्वारो ग्रहा अतिग्रहाश्च निर्ज्ञाता वाक्चक्षुः | शङ्का—किंतु वहाँ तो वाक्, चक्षु, प्राण और मन—इन चार ग्रह और अतिग्रहोंका ज्ञान है ही; अतः |