भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 680, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 680
६७०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

| एतस्य त्वत्पृष्टस्य वेदितव्यं यत्, वेदिष्यावो निरूपयिष्यावः; कस्मात् ? न नौ आवयोरेतद्वस्तु सजने जनसमुदाये निर्णेतुं शक्यते; अत एकान्तं गमिष्यावो विचारणाय । | है, उसे हम दोनों ही मिलकर निरूपण करेंगे । क्यों ? क्योंकि हम दोनों इस वस्तुका जनसमुदायमें निर्णय नहीं कर सकते; इसलिये इसका विचार करनेके लिये एकान्तमें चलेंगे । | | तौ हेत्यादि श्रुतिवचनम्, तौ याज्ञवल्क्यार्तभागावेकान्तं गत्वा किं चक्रतुः ? इत्युच्यते—तौ होत्क्रम्य सजनाद्देशान्मन्त्रयाञ्चक्राते; आदौ लौकिकवादिपक्षाणामेकैकं परिगृह्य विचारितवन्तौ । तौ ह विचार्य यदूचतुरपोह्य पूर्वपक्षान् सर्वानैव, तच्छृणु; कर्म हैव आश्रयं पुनः पुनः कार्यकारणोपादानहेतुं तत्रोचतुरुक्तवन्तौ । न केवलम्; कालकर्मदैवेश्वरेष्वभ्युपगतेषु हेतुषु यत् प्रशंसंसतुस्तौ, कर्म हैव तत् प्रशंसंसतुः । | 'तौ ह' इत्यादि श्रुतिका वचन है; उन याज्ञवल्क्य और आर्तभागने एकान्तमें जाकर क्या किया ? सो बतलाया जाता है—उन्होंने जनसमुदाययुक्त स्थानसे निकलकर परस्पर विचार किया । पहले लौकिक वादियोंके पक्षोंमेंसे एक-एकको लेकर मीमांसा की । इस प्रकार मीमांसा कर समस्त पूर्वपक्षोंका निराकरण कर उन्होंने जो कहा, सो सुनो; वहाँ उन्होंने पुनः-पुनः कर्मको ही आश्रय अर्थात् देह और इन्द्रियोंके ग्रहणका हेतु बतलाया । इतना ही नहीं, अपितु स्वीकार किये हुए काल, कर्म, दैव, ईश्वर आदि हेतुओंमें भी उन्होंने जो प्रशंसा की वह कर्मको ही की । | | यस्मान्निर्धारितमेतत् कर्मप्रयुक्तं ग्रहातिग्रहादिकार्यकारणोपादानं पुनः पुनः, तस्मात् पुण्यो वै शास्त्रविहितेन पुण्येन कर्मणा | क्योंकि पुनः-पुनः यही निश्चय किया गया है कि ग्रहातिग्रहादिरूप कार्य-करणसंघातका ग्रहण कर्मजनित है, इसलिये पुरुष पुण्य यानी शास्त्रविहित कर्मसे पुण्य (पुण्ययोनियुक्त) |

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