भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 694, कुल 1402 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 694

६८४ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय ३

| कस्य सर्वेषां रूपदर्शनसाधनत्वे उलूकादय आलोकेन रूपं न पश्यन्तीत्युलूकादिचक्षुषो वैलक्षण्यादितरलोकचक्षुर्भिनं रसादि-विषयत्वं परिकल्प्यते; रसादि-विषये सामर्थ्यस्यादृष्टत्वात्। सुदूरमपि गत्वा यद्विषये दृष्टं सामर्थ्यं तत्रैव कश्चित् विशेषः कल्पयितव्यः।<br><br>यत् पुनरुक्तं विद्यामन्त्रशर्करा-दिसंयुक्तविषदध्यादिवन्नित्यानि कार्यान्तरमारभन्त इति; आर-भ्यतां विशिष्टं कार्यं तदिष्टत्वाद-विरोधः। निरभिसन्धेः कर्मणो विद्यासंयुक्तस्य विशिष्टकार्यान्त-रारम्भे न कश्चिद् विरोधः। देवयाज्यात्मयाजिनोरात्मयाजिनो विशेषश्रवणात् "देवयाजिनः श्रेयानात्मयाजी" इत्यादौ "यदेव | सबके लिये रूपदर्शनका साधन है, तथापि उल्लू आदिको प्रकाशसे रूपकी उपलब्धि नहीं होती; इस प्रकार उल्लूकी दृष्टिमें अन्य जीवोंकी दृष्टिसे विलक्षणता होनेसे भी उसका विषय रसादि नहीं कल्पना किया जाता; क्योंकि रसादि विषयमें नेत्रका सामर्थ्य नहीं देखा जाता। बहुत दूर जाकर भी जिस विषयमें जिसका सामर्थ्य देखा जाता है, उसीमें कुछ विशेषकी कल्पना करनी चाहिये; [सर्वथा विपरीत कल्पना करनी उचित नहीं है]।<br><br>और ऐसा जो कहा कि विद्या, मन्त्र एवं शर्करादियुक्त विष और दधि आदिके समान नित्यकर्म किसी अन्य कार्यका आरम्भ करते हैं, सो वे भले ही किसी विशिष्ट कार्यका आरम्भ करें, वह इष्ट होनेके कारण उससे हमारा कोई विरोध नहीं है। फलाशारहित विद्यासंयुक्त कर्मके विशिष्ट कार्यान्तर आरम्भ करनेमें हमारा कोई विरोध नहीं है; क्योंकि "देवयाजीसे आत्मयाजी श्रेष्ठ है" तथा "जो भी विद्यासे करता है वह बलवत्तर होता है" इत्यादि |