भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

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पृष्ठ 7

श्रीहरिः

प्रथम संस्करणकी प्रस्तावना

यस्य बोधोदये तावत् स्वप्नवद् भवति भ्रमः ।
तस्मै सुखैकरूपाय नमः शान्ताय तेजसे ॥
( अष्टावक्रगीता )

आज प्रायः इक्कीस वर्ष होते हैं जब मैंने पहले-पहले बृहदारण्यक उपनिषद्‌का एक वाक्य सुना था । वह क्षण इस जीवनमें कभी भूल सकूँगा ऐसी आशा नहीं है । उस समय मैं आगरा कालेजका विद्यार्थी था । एक दिन स्थानीय डी० ए० वी० हाई-स्कूलमें कोई उत्सव था । एक श्रोताके रूपमें मैं भी वहाँ बैठा था । मेरे श्रद्धेय बन्धु श्रीधर्मेन्द्रनाथजी शास्त्री, तर्कशिरोमणिका भाषण हो रहा था । उन्होंने याज्ञवल्क्य-मैत्रेयीके प्रसङ्गकी चर्चा करते हुए मैत्रेयीके ये शब्द कहे—

'येनाहं नामृता स्यां किमहं तेन कुर्याम् ।' ( २ । ४ । ३ )

उस समयसे यह वाक्य मेरा पथप्रदीप बन गया । वैराग्यकी जागृतिके लिये इसकी जोड़का कोई दूसरा वाक्य मैंने सम्भवतः अपने जीवनमें नहीं सुना । इससे अधिक मर्मस्पर्शी कोई दूसरी बात कही जा सकती है—ऐसी मेरी कल्पना भी नहीं है ।

अस्तु, आज करुणामय प्रभुने उसी उज्ज्वल रत्नकी खानि इस महाग्रन्थको जनताके सामने रखनेका मुझे सौभाग्य दिया है । इसकी महिमाका वर्णन करना सूर्यको दीपक दिखाना है । वस्तुतः उपनिषद् ही तत्त्वज्ञानके आदि स्रोत हैं । उनसे निकलकर ही विविध वाङ्मयके रूपमें विकसित हुई ज्ञान-गङ्गा जीवोंके संसार-तापको शमन करती है । बृहदारण्यक उपनिषद् यजुर्वेदकी काण्वी शाखाके वाजसनेयब्राह्मणके अन्तर्गत है । कलेवरकी दृष्टिसे यह समस्त उपनिषदोंकी अपेक्षा बृहत् है तथा अरण्य (वन) में अध्ययन की जानेके कारण इसे 'आरण्यक' कहते हैं । इस प्रकार