बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 705, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 705
ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६९५
| अगच्छन् वै ते पारिक्षिताः, तत् तत्र; क्व ? यत्र यस्मिन्नश्वमेधयाजिनो गच्छन्ति, इति निर्णीते प्रश्ने आह-क्व नु कस्मिन्नश्वमेधयाजिनो गच्छन्तीति । तेषां गतिविवक्षया भुवनकोशपरिमाण माह— | पारिक्षित वहाँ चले गये। कहाँ ?-जहाँ अर्थात् जिस लोकमें अश्वमेधयाजी जाते हैं—इस प्रकार प्रश्नका निर्णय हो जानेपर भुज्यु बोला—'कहाँ अर्थात् किस लोकमें अश्वमेधयाजी जाते हैं?' तब याज्ञवल्क्य उनकी गति बतलानेकी इच्छासे भुवनकोशका परिमाण बताते हैं— |
| द्वात्रिंशतं वै, द्वे अधिके त्रिंशद् द्वात्रिंशतं वै, देवरथाह्नानि—देव आदित्यस्तस्य रथो देवरथस्तस्य रथस्य गत्या अह्ना यावत् परिच्छिद्यते देशपरिमाणं तद् देवरथाह्न्यम्, तद् द्वात्रिंशद्गुणितं देवरथाह्नानि, तावत्परिमाणोऽयं लोको लोकालोकगिरिणा परिक्षिप्तः; यत्र वैराजं शरीरं यत्र च कर्मफलोपभोगः प्राणिनां स एष लोकः; एतावाँल्लोकः, अतः परम् अलोकः । | यह लोक द्वात्रिंशत्—दो अधिक तीस अर्थात् बत्तीस देवरथाह्न्य है। देव है आदित्य (सूर्य) उसका रथ ही देवरथ है, उस रथकी गतिसे एक दिनमें संसारका जितना भाग मापा जाता है, उतना देवरथाह्न्य कहलाता है, उसको बत्तीसगुना करनेपर बत्तीस देवरथाह्न्य होते हैं। लोकालोकपर्वतसे घिरा हुआ यह लोक इतने परिमाणवाला है; जहां वैराज शरीर है और जिसमें प्राणियोंके कर्मफलका उपभोग होता है, वह यही लोक है। इतना तो लोक है; इससे आगे अलोक है। |
| तं लोकं समन्तं समन्ततः लोकविस्ताराद् द्विगुणपरिमाणविस्तारेण परिमाणेन, तं लोकं परिक्षिप्ता पर्येति पृथिवी; तां पृथिवीं तथैव समन्तम्, द्विस्तावद् | उस लोकको चारों ओरसे लोकविस्तारकी अपेक्षा दूने परिमाणके विस्तारवाले परिमाणसे पृथिवी घेरे हुए है। इसी प्रकार उस पृथिवीको उससे दूने परिमाणसे सब ओरसे |