बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 710, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 710
| ७०० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |
|---|
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| सर्वस्याभ्यन्तरः सर्वान्तरः; यद्यः-<br>शब्दाभ्यां प्रसिद्ध आत्मा ब्रह्मेति-<br>तमात्मानम्, मे मह्यम्, व्या-<br>चक्ष्वेति, विस्पष्टं शृङ्गे गृहीत्वा<br>यथा गां दर्शयति, तथा आचक्ष्व,<br>सोऽयमित्येवं कथयस्वेत्यर्थः । | प्रसिद्ध है—तथा जो सर्वान्तर—सबके अभ्यन्तर है—श्रुतिमें 'यत्' और 'यः' इन पदोंसे यह प्रदर्शित किया जाता है कि यह प्रसिद्ध आत्मा ब्रह्म है—उस आत्माका मेरे प्रति व्याख्यान करो—जिस प्रकार सींगोंको पकड़कर गौ दिखलाते हैं, उसी प्रकार स्पष्ट बतलाओ अर्थात् वह यह है—इस प्रकार उसका वर्णन करो। |
| एवमुक्तः प्रत्याह याज्ञवल्क्यः—<br>एष ते तवात्मा सर्वान्तरः सर्व-<br>स्याभ्यन्तरः; सर्वविशेषणोपल-<br>णार्थं सर्वान्तरग्रहणम्; यत्<br>साक्षाद् अव्यवहितम् अपरोक्षा-<br>दगौणं ब्रह्म बृहत्तमम् आत्मा<br>सर्वस्य सर्वस्याभ्यन्तरः, एतै-<br>र्गुणैः समस्तैर्युक्त एषः, कोऽसौ ?<br>तवात्मा; योऽयं कार्यकारणसङ्घा-<br>तस्तव, स येनात्मना आत्मवान्<br>स एष तव आत्मा—तव कार्य-<br>करणसङ्घातस्येत्यर्थः । | इस प्रकार कहे जानेपर याज्ञवल्क्यने उत्तर दिया, 'तेरा यह आत्मा सर्वान्तर—सबका अन्तर्वर्ती है। 'सर्वान्तर' शब्दका ग्रहण समस्त विशेषणोंके उपलक्षणके लिये है। जो साक्षात्—अव्यवहित और अपरोक्ष—अगौण ब्रह्म—बृहत्तम आत्मा सबके अभ्यन्तर है, यह इन समस्त गुणोंसे युक्त है; वह कौन है ?—तेरा आत्मा है; यह जो तेरा कार्य-करण (देह-इन्द्रिय) संघात है, वह जिस आत्माके द्वारा आत्मवान् है, वही यह तेरा आत्मा है; तेरा अर्थात् कार्य-करणसंघातका। |
| तत्र पिण्डः, तस्याभ्यन्तरे<br>लिङ्गात्मा करणसङ्घातः, तृतीयो<br>यश्च सन्दिह्यमानः—तेषु कतमो | अब, भुज्युके यह कहनेपर कि पहला तो पिण्ड है, उसके भीतर इन्द्रियसंघातरूप लिङ्गदेह है और तीसरा वह है, जिसके विषयमें सन्देह |